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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1774

( ५२ )

बोधसागर

जो कोई पुण्यातम लोई । छायाको अनुभव तिहि होई ॥
सुन्दर सर वापी विधि नाना । चहुँदिश बने सोहावनथाना ॥
सुखद पंथसे तेहि लेजाही । पापीको सब बुःख दरशाही ॥
धर्मरायके ढिग जब जावै । चित्रगुप्त तब लेख लगावै ॥
चित्रगुप्त क्रम कागज खोले । सबके पुण्य पापको बोले ॥
चित्रगुप्त जस न्याव चुकावै । तैसे जीव दुःख सुख पावै ॥
बडे पूण्यते स्वर्ग बसेरा । जगमें सब सुकर्म जिन केरा ॥
जहां तहां शोभित बन बागा । भांति २ के दुम तहाँ लागा ॥
इन्द्रके नन्दन बनकी शोभा । जाहि देखि मुनिवरमनलोभा ॥
देव अंगना केर छवि भारी । महा मोहनी रूप सँवारी ॥
स्वर्ग गुन सुख कथे बहुता । लहे जीव निज पुण्य प्रसूता ॥

दोहा-जैसे स्वर्गमें सुख घने, तिभि दुःखनर्कअनंत ।

होय जहां यमयातना, बहुविधि वेद वदंत ॥

इति

अथ प्रलयवर्णन-चौपाई

तैतालिस लाख बीस हजारा । चहुँ युग आयु यकठै धारा ॥
ताको सहस गुना पुनि करिये । एक ब्योस ब्रह्माको धरिये ॥
जैसी दिन तैसी है राती । जागे ब्रह्मा रैन सिराती ॥
दिनमें करै जगतको काजा । रैनमें निद्राको सुख साजा ॥
रैनमें सबही जगत नशाना । चन्द्र सूर्य लम्बादिक नाना ॥
केते ऋषि मुनि सहितविधाता । जीये और सकल विनसाता ॥
बहुरि वेद ऐसो अनुमाना । ब्रह्मा सहित सकल विनशाना ॥
दूजा ब्रह्मा पुनि तन धारी । कारय सकल करे संसारी ॥
जन्मको सूतक बहु नहि टूटै । एक मेरे दूजा पुनि जूटै ॥
न्यायशास्त्रअरुसांख्य बखाना । सकलकृतमतिदिकालसिराना ॥