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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1709

श्वसगुञ्जार

( ११ )

कर्मी एक रोष निर्मावा । निरखत ताहि तत्त्व कर भावा॥
कपट सनेह कर्म सहिदानी । ताकर अङ्गसत्य करै हानी ॥
शब्द विचारि करेहु गुरुआई । पूरी तत्त्व लेहु सङ्ग लाई ॥
जेतिक लक्ष जीवकी काया । तेते पान साथ निर्माया ॥
रेखा गुञ्ज विचारेहु जानी । विषमतिछर करिहैजिम हानी ॥
गुरुकी रेखा जाहि पर होई । छत्र सोहावन पर्शे मिति सोई ॥
गुञ्ज औ छत्र शरन मुक्तायहु । ताहि पानपर अंक चढायहु ॥
सत्य शब्द पारस परसायहु । ॥
पारस मनि है तत्त्व सनेही । तासु लगन लै पान उरेही ॥
पावत पान हंस घर जाही ।
पौन सजीवक जावन नेहा । तत्त्व लगन लै सुरति सनेहा ॥
सत्य नाम मुक्तत सठिहारा । सो सहिदानी पान सुधारा ॥
छत्रके छल होई जेहि पाना । तापर अंक लिखै निर्बाना ॥
जाहि देहु हंसन कह खाहा । पान छत्र मणि दीजै ताहा ॥
निशदिन रहैं जो सुरति समानी । सो दीजै सीखन सहिदानी ॥
धर्मदास तुम जेठे भाई । हम लहुरे कीन्हा अधिकार्ई ॥
तुम्हरी वस्तु तुमहि कहैं दीन्हा । अब हम लोक पयाना कीन्हा ॥
जेते जीव आहि जगमाही । सो सब आवै तुम्हारे बाही ॥
तुम्हरे शिर जीवन कर भारा । आदि अन्तको तुम कडिहारा ॥
तुमरे हाथ जीवकर काजा । काल डसैं तब तुम कहैंलाजा ॥
वंश वयालिस कुलके राजा । ज्ञान गम्य सबै तेहि साजा ॥
उन्हके पास जीव जेते जावैं । सो सब सत्य लोक कह आवैं ॥
बंशके बंश छत्र मनिहारा । सोइ शब्द सुत वंश हमारा ॥
जेहिवां देइ सो लेकर जाई । काल डसैं नहि मोरि दुहाई ॥
बंशके बाँह जीव जत आवैं । यमकी नाक छेदि घर जावैं ॥