सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1708, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1708

( १८ )

बोधसागर

शिला ऊपर फिरि अंकसुधारैहु । शुक्तीकी श्वासा तहँ चारेहु ॥
ता ऊपर पुनि धरहु कपूरा । काल अंश होवै सब दूरा ॥
चौकाके बाएँ अस्थाना । आरति थार धरेहु सहिदाना ॥
आद्याके श्वासा सुख मूरी । ताको नाम सुधारहु पूरी ॥
अंक सुधारिके आसन कीन्हैहु । ताके ऊपर थार जु दीन्हैहु ॥
तिसरी श्वास करुणा मैं उचारहु । सुमिरणसारसत्यमुखभाखहु ॥
सुगन्ध सुपारी तापर राखहु ।
चौका कलश मध्य अस्थाना । धरहु मध्य धोती औ पाना ॥
नरियर मिष्ठानमध्यमें राखेहु । धोती पान बचनअभिलाषेहु ॥
इहिविधिकी यह सब विधिपूरा । सुमिरतके हम होव हजूरा ॥
लोक निशान पुरुषजो भाखा । सो हम गुप्त एको नहिं राखा ॥
सब विधि ज्ञान तुम्हें हमदीन्हाँ । अब हम लोक पयाना कीन्हाँ ॥
नारियर है ब्रह्मा कर माथा । सो हम दीन्ह तुम्हारे हाथा ॥
ताके मध्य जीव सहिदानी । मानतताहिकियहु विलछानी ॥
ज्योति कपूर कियेहु प्रसङ्गा । काल अंग परसतहोइ भङ्गा ॥
सतएँ श्वासा ताके सङ्गा । जाते यमकर मिटै तरंगा ॥
जैसी लक्ष्य जीवके पासा । हाथ नारियर नीकसुतासा ॥
कर्मौ जीव कर्मके बांधा । निर्णय भेद न जानहिं अन्धा ॥
अङ्ग छिपाइ करै जिव बोटा । ताकर होय नारियर खोटा ॥
निर्मल हँस होय सुखदाई । मोरत नारियर वास उडाई ॥
निर्मल अंकुर सेतपुर होई । शब्द सनेही प्रीतम सोई ॥
जैसी दशा जीवकी जानी । प्रकट होय जब नरियरभानी ॥
जेते लपट तासुकी काया । सो नरियरमें होय सुभाया ॥
नरियर एक होय जलरंगी । सतगुरु सत्यशब्द परसंगी ॥
पारसते ताकी उत्पानी । हँस दया धीर निकसी खानी ॥