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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1702

( ९२ )

बोधसागर

समाधान होइ आगम पावै । ता घट चोर न मूसन आवै ॥
लगन जानि जो पाँजी पावै । तत्त्व सनेह विलोक सिधायै ॥
आगमकी गति काया देखै । पर्वत नाम मंडल हित लेखै ॥
पर्वत पांच नाम अनुमाना । कहौ भेद सुन संत सुजाना ॥
पाँचौ पर्वत नजरि समावै । काया भेद नजरि तब आवै ॥
रवि लीला एक पर्वत भारी । चंद उनेह दूसर अधिकारी ॥
दुइके बीच सुमेर अनुमाना । देखत ताहि हंस निर्बाना ॥
चौथे मलय गिरि कैलासा । गोमत नाम पँचए परकासा ॥
पाँचौ पर्वत देखै सोई । गुरुगमि बुद्धि जाहि तन होई ॥
जब देखै तब कुशल शरीरा । विन देखै जानै तन पीरा ॥
रवि गिरि जादिन नजरेनआवै । तेजहि तन ना कष्ट जनावै ॥
चन्द्र शिखर जादिन नहि देखै । द्रव्यशोक कछु हानि विवेखै ॥
जादिन कैलास नजरेनहि आवै । मित्र हानि दुख खबरिजनावै ॥
गोमत पहार नजरि नहि आवै । काया कष्ट देश दुख पावै ॥
गिरि सुमेर जादिनहीं देखै । अन्तकाल तन घाव विशेषै ॥
रसना कान नजरि नहि आवै । मास सातमहँ काल चलावै ॥
जाकी रसना चूमक वासा । सो नहि देखै सदा निवासा ॥
पर्वत धवला नजरि नहि आवै । मास एक महँ मृत्यु जनावै ॥
तादिन काल चौकीअग आवै । ध्रुवमंडल नजरै नहि आवै ॥
सो सतगुरु जो होय सयाना । जैमुन जानि देह तेहि पाना ॥
जबतै काया आगम नहि पावै । तबतै अमी बीज नहि पावै ॥
काम बसी पावे जो ताही । बोरे विषम सरोवर माहीं ॥
काया श्वास चलै पर मेहा । काल वश्य होय छाँडे देहा ॥
पश्चिम लहरी जो गावै जानी । पांजी द्वार लखै सहिदानी ॥
चंद उगे सूर्य अथवै जबही । हंस सुजन तन यागै तबही ॥