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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1701

श्वसगुआर

( ९१ )

ता काया की यह सहिदानी । सो काया मम हाथ विकानी ॥
ऐसा काल भया अज्ञानी । हमसे लीन्हि सन्देह निसानी ॥
नरकी देह कालके हाथा । झाँई चले ताहिके साथा ॥
काया सरी गली इहाँ जाई । झाँई जानि गहै यमराई ॥
गहै काल औ लेखा लेई । धोखा लाइ नरक मई देई ॥
तेकाया कर करै विचारा । तीन लोक तजिहोए निन्यारा ॥
सहज सुन मह पकरै काला । झाँई साथ करै जझाला ॥
काया धरिके लज्जित कीन्हों । तेहि कायाकर माँगै चीन्हों ॥
देह धरे कीहिसि अति चारा । झाँई साथ जाए नहिं पारा ॥
सो झाँई जो इहइ बिबेखे । कंठ ध्यान धरिहम कह देखे ॥
अखंड मंडील मह काया रहई । ताकर भेद जानके गहई ॥
एह काया तजि ईहई वासा । झाँई तजी होयलोक निवासा ॥
सत्य शब्द जानै जो कोई । ताको आवा गौन न होई ॥
शब्द शब्द जो जीव न पावै । झाँइ साथ गर्भ फिरि आवै ॥
आवा गौन लखै सहिदानी । आदि अंतकी बूझे बानी ॥
गुण अवगुण झाँईके संगा । ताते काल करै मतिभंगा ॥
झाँई झमकि दिखावै गाता । आदि अंतकी बूझे वाता ॥
हमरी कयोंकर ध्यान लगावै । देखत ताहि परम सुख पावै ॥
जब वह काया काल चुरावै । काया परिचय आगम पावै ॥
काया परिचय भेद विचारै । नाम सुमिरिके हंस उबारै ॥
अंग अंगकी परिचय देखै । आगम जानि हरषितमन लेखै ॥
हर्षित रहै सदा दिलमाहीं । शोक मोह कछु व्यापै नाहीं ॥
कर औ शीश जानिके भावा । मास बरष कर आगमपावा ॥
आगम जानि गहै सहिदानी । बोलै सत्य शब्दकी बानी ॥
आगम जानि रहे लौ लाई । छूटत देह लोक तब जाई ॥