कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1691, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्वसगुञ्जार
( ८१ )
काग बुद्धि मन दशा छुडावै । पावै शब्द लोक सो आवै ॥
स्वेत कुष्ठ मद गात मलीना । कर्म विश्व विषयी लौलीना ॥
जहद कुष्ठ मोती मनी भारी । धुन्द्य कुहेर बहिरी रक्तारी ॥
शून्य भाग्य दाग मतिमारी । फोकट कुष्ठ औ गंध पहारी ॥
रक्तविकार जहर धुनि फीका । अंग मलीन कर्मको लीका ॥
पाछिल कर्मज नरकी देहा । परखे सतगुरु शरण सनेहा ॥
तासु निशान परखिके काया । नेत्र गुञ्ज विषवाण बनाया ॥
कर्म निशान दशा पहिराया । तनविकार गुरुवचन नभाया ॥
तेहि जनि देहु मुक्ति बर बीरा । निश्चय काल करै बड पीरा ॥
पीरा सहे जीव शब्द न मानै । गुरु निन्दा निशिवासरजानै ॥
निन्दा करत जाइ यमदेशा । ज्ञान बुद्धि नाह गहै सदेशा ॥
गुरुकी दया जो मुखमहँ आनै । लोभ लहरि ममता मनसानै ॥
कबहिं न होहि ताहिकरकाजा । कितनो करै बुद्धिकर साजा ॥
गुरु निन्दा कुष्टी औतारा । परै रौर नरककी धारा ॥
सो सतगुरु जो होहि सयाना । ऐसे जीव कहँ देह न पाना ॥
पान लेइ अंतै बगडावै । स्वर्ग नर्क महँ ठाँव न पावै ॥
तनकी दुर्मति लहै न पारा । भजै राज नर्ककी धारा ॥
कर्मी खानि दहे नर पावै । पाछिल अवगुण संगहि आवै ॥
तेहि जनि देऊ शब्दसहिदानी । मानहु सत्य शब्दकै बानी ॥
धोखे आइ पान जो लेई । पाछै समुझि सिखावनि देई ॥
सुनत सिखावन हर्षित होई । ताहि देहु गुरुशब्द बिलोई ॥
गुरु की त्रास करै लौ लीना । सुनत सिखापन होइ अधीना ॥
मानै त्रास रहै लौ लाई । पावत पान करम कटि जाई ॥
उतपनि लगनजो साधहु धीरा । ताहि लगन सँग साजहुबीरा ॥
नाम पान पाँजी समुझायहु । सत्य शब्दकी रहनि बतायहु ॥