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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1690

( ८० )

बोधसागर

एकचक्र अथवा दुइ होई । कछु ज्ञानी कछु दुर्मति खोई ॥
तीनि होय तो होय उदासा । चार होय तो सूर्य प्रकाशा ॥
पाँचौ शंख होय करमाहा । दुख दारिद जान अवगाहा ॥
सीप होई तौ होय उदासा । शब्द प्रतीत शब्दकी आसा ॥
नखशिख रेख बिचारेहु जानी । तबहि सुधारेहु हंसकी खानी ॥
समय-नख शिख जानिके, तबहि सुधारेहु पान ।
भर्मभूत नहिं दर्शही, हंस होय निर्बान ॥

चौपाई

निर्खहु आदि अंत सहिदानी । गुण अवगुण देखहुँ बिलछानी ॥
कर्मजीव काल अधिकारा । कर्मके घर लेई अवतारा ॥
वरण भेद परिसै कुल जाती । रेखा लेख देखै उतपाती ॥
कर्मों काल कर्म वश होई । गुण अवगुण सबदेखिबिलोई ॥
उपजै चोर जुआरी झूँटा । कर्मों काल कर्म धरि लूटा ॥
कामीके घर कर्मों होई । कर्म रेख तब देख बिलोई ॥
कर्म खानि कायामहँ बासा । सुनै शब्द चित होई उदासा ॥
भर्म भूतकी गहै निसानी । पूजै शिला औ उलछै पानी ॥
मारु मारु मुख बानी भाखै । मन बशि जीव काल घर राखै ॥
नेत्र बिरह रस खुकुटी छीना । कबहुँ चंचल कबहुँ मलीना ॥
बालक होई पौनके साथी । मदमातै जस मैगल हाथी ॥
तिन जीवनकी दशा मिटावै । पाछे सत्य शब्द ससुझावै ॥
पद्म मुरक जाके तन होई । सो कर्मों जग जीवै लोई ॥
दया लगनकी परमित पावै । निर्मल हो सत्यलोक सिधावै ॥
नेत्र विशाल रक्तकी झाई । सुरति सनेह ज्ञान बहुताई ॥
जब तब चितमहँ संशय आवै । ज्ञान गम्यते मार बहावै ॥
ताकी निर्णय अगम सुभाऊ । पावै सत्य शब्दको दाऊ ॥