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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1657

शवासगुप्कार

( ४७ )

टूटे तार तत्वकी जबही । काल सन्धि पावै घट तबही ॥
टूटे तत्व होय दुख क्रा । चन्द्रहि पेली ऊगै घर सूर । ॥
धरि शशि सूर्य काल लै जाई । बांधि अकाश राखै विरमाई ॥
चन्द्र सूर्य आसा सहिदानी । पारस तत्व लेइ अस छानी ॥
पारस टूटत होय मलीना । निशवासर जीव काल अधीना ॥
पारस सङ्गहि लेइ निचोई । छांडि देइ जब जाने सोई ॥
छिन बाहर छिन भीतर धाया । जरामरण व्यापै आ माया ॥
एक तत्व सङ्ग सबै विगोई । एक तत्व उपजे सब कोई ॥
शिव घर सूर्य होय उजियारा । एक तत्व निश वासर धारा ॥
पारस परसि होय विधिधूरा । प्रेम प्रकाश ऊगै घट सूर । ॥
एकतत्व चलै रवि धारा । सूर्य सिंध घट तेज अपारा ॥
शक्ती देह चन्द्र रखवारा । चले तत्व जल रङ्ग अपारा ॥
एकतत्व निशवासर धावै । सातबार टूटे नहिं पावै ॥
एक समाधि रहत अस्थूला । तब शक्ती घट फूले फूला ॥
फूलत फूल तहां अकुलाई । मनबिकार तन रुधिर चलाई ॥
ताहि समै तन खीर समावै । शिव सनेह रचि काम जनावै ॥
ताहि समै शिवशक्ती परशै । रति रुचि अमी गर्भ तेहि द्रशै ॥
रहै गर्भ कामिनिकी देहा । उपजे जातक वरन सनेहा ॥
पुरुष देह शशि चलैजो धारा । कन्या उपजै कला अपारा ॥
सूर्य सनेह चलै जो धारा । उपजै कन्या कला अपारा ॥
सूर्य सनेह चलै जो धारा । उपजे सूरति सार कुमार । ॥
रहै गर्भ तब काया साजै । रुधिर मांस तिलतिल उपराजै ॥
पांच तत्व तीनों गुण मूला । तासों रचे गर्भ अस्थूला ॥
शिवके आस बांये स्वरूपा । शक्ती गहै जानिके रूपा ॥
शिवके रूप शक्ति गहि लेई । तब सांचा मई जावन देई ॥