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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1656

( ४६ )

बोधसागर

दुइ घर रवि शशि जीव बसावै । इक घर राहु केतु भच्छावै ॥
चारिउ चारि दिशा चलि जाई । फिर चारिऊ एकमाँह समाई ॥
दुइ झंझरी परशि फिरि आवै । दुइ फिरि झंझरी बाहर धावै ॥
घर आवत राखै अटकावै । राहु केतु दोई रहन लगावै ॥
जादिन पांच तत्त्व नहिं धावै । तादिन कालगहन नहिं लावै ॥
दुवो तुरै जा निकसे धाई । फोरी द्वारी बाहर जाई ॥
बाहर अमी अमान अमाया । उत्पति पारस नारी काया ॥
नारी नेह निरञ्जन काया । ताते शिव शक्ती उपजाया ॥
एहि निजबुझहु धरमन भाया । नाना वानी वरन बनाया ॥
शिवकाया पति सूर्य सनेहा । ऊगे चन्द्र शक्तिकी देहा ॥
शिवकी देह सूर्य प्रभु साजा । शक्ती देह चन्द्र है राजा ॥
रवि शशि पांच तत्त्वदइकाया । एक एक संग उपजे काया ॥
एकतत्त्व निश वासर धावै । जीवका मूल परोस सुखपावै ॥
जीव मूल पारस परवाना । लेउत्पति पारस जाय ठिकाना ॥
मन जिव तत्त्व एक चढि धावै । लै पारस अपने घर आवै ॥
पारस आनि जगावे कामा । बिरह बाण मारे संग्रामा ॥
दोई तत्त्व निर्वाण उजागर । दुइ घटशिवशक्ती मनि आगर ॥
पारस एक दुवोंकी काया । चंद्र सूर्य संगही उपजाया ॥
चंद्र उगै शक्तीकी देहा । चलै तत्त्व जलरंग सनेहा ॥
एक तत्त्व चंद्र घर धारा । सात रोज एकै व्यवहारा ॥
सात वार निश वासर धावै । पल पल बढै घटै नहिं पावै ॥
पारस परसि होइ जिव पूरा । शक्तीशशि घरशिव घरसुरा ॥
एकतत्त्व संग पारस पावै । राहु केतु नहिं गहन लगावै ॥
तत्त्व तार टूटै नहिं पावै । बिना सिधनी काल समावै ॥
एकै पेली एक जो धावै । तौ शक्ती नहिं पारस पावै ॥