कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1643, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्वसगुआर
( ३३ )
साइ विष लेय तीर्थको आवै । चंद्र कमल पर जाय समावै ॥
एहिविधि चंद्रपक्ष चलि जाई । पाछै जीव सूर्य घर जाई ॥
पूनिमा बीते परिवा आवै । तब रथ चढिके सूर्य सिधवै ॥
सुरंग तुरै पर होय असवारा । योजन तीनि जाय चढिपारा ॥
सुखसागरमें पैठि नहाई । परसै योग सँताय न पाई ॥
अमृत मानसरोवर माहां । कामिनि दूरि धरै बोले ताहां ॥
सो अमान सुखसागर माहां । सूर्यके संग पीवे जिव ताहां ॥
पिये अमी जिव सूर्यके संग । मिटै तपत होय शीतलअंगा ॥
पल भीतर पल बाहर आवै । पीवै अमी रस तेज समावै ॥
जबही सूर्य अमीरस पावै । चंद्रहि पकरि आपुघर लावै ॥
जब चंदा आवै रवि द्वारा । होइ संक्रमण तेज अपारा ॥
तेज किरण पूरण जब होई । दरशाहि काल तपै रवि सोई ॥
तपै तेज बारहको धावै । सुखसागरमें पड़ि नहावै ॥
सुखसागरमें कर अस्नाना । उदितकमलहोइ द्वादश भाना ॥
सूर्यपर चंद होय जब जोरा । तब घर काल करै घनचोरा ॥
चन्द्र सूर्य कह राहु जो फाँसे । पल चन्दा पल सूर्यहि आसे ॥
इहि विधि देह डुइनको बाजी । पूनम धरिहि अमावससाजी ॥
चन्द्र सूर्य लै जाय अकाशा । सुखमुनिके घरदोजकर फाँसा ॥
मुसकि तुरौपर होइ असवारा । घरे शशि सूर्य अकाशके द्वारा ॥
जंबूद्वीप काल अस्थाना । सहज शून्य कह करै पयाना ॥
सहज शून्यमहैं पहुँचे जाई । सहज रहावै संग लगाई ॥
योजन डेठ सहजकर बासा । तहवाँ करै काल रहवासा ॥
सहज कालसों अंतर नाही । जीवहि छलै सहजकी बाही ॥
पलमें जंबूद्वीपहि आवै । पलमहैं सहज शून्यकहैं धावै ॥
एहिविधि चंद्र सूर्य दोह कांसै । काल सहज होय जीव गरासै ॥