कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1642, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३२ )
बोधसागर
चारि तीर्थमहँ प्रतिमा भारी । सत्यसुकृत तहाँ पुरुष औ नारी ॥
स्वासा संयम राह सुधारी । देवल चारि देव हैं चारी ॥
घट भीतर घट राह अपारा । चाँद सूर्य ताके रखवारा ॥
उत्तर चँद तीरथ कहँ धावै । परसि तीर्थ अमृत लै आवै ॥
एकजीव दुइ अंग समाना । जन्द्र सूर्यके हाथ विकाना ॥
दक्षिण स्वर तीरथको धावै । तीरथ परसि जहर लै आवै ॥
शुक्लपक्ष जब पूनो जब आवै । तबही जीव चन्द्र घर आवै ॥
जलरैंग तत्व चँद असवारा । सो परसै घाइअमृत रसधारा ॥
जीव चन्द्रके साथेहि धावै । योजन चारि पार पहुँचावै ॥
करि असनान पुरुष पग परसै । निर्मल ज्योति अखंडितदरसै ॥
जब फिरि चन्द्र सरोवर आवै । बहुरि जीवसँगहि फिरि धावै ॥
आवत जात बार नहिँ लावै । पल पल जीव दरसतहाँ पावै ॥
कृष्णपक्ष अमावस जब आवै । तब फिरि जिव सूर्यघर आवै ॥
सूर्य तेजपर होइ असवारा । बरसै अग्नि अखण्डित धारा ॥
जाय निकसि योजन परवाना । विषय सरोवर करै अस्नाना ॥
परसै देव निरंजन पाई । लागे झार जीव कुँभिलाई ॥
जीव सूर्य फिरि कमल समावै । पल बाहर पल भीतर आवै ॥
सूर्यसंग विष पीवै अघाई । मूर्च्छित होय चन्द्रघर जाई ॥
जाय अमावस परिवा आवै । चढि रथ ऊपर चन्द्र सिधावै ॥
वायु तत्वपर होय सवारा । चले चंद दुइ योजन पारा ॥
विषम सरोवर पार सिधावै । मान सरोवर पारस पावै ॥
नागिनि एक सरोवर माहीं । पीय अमृत विषछांडे ताहीं ॥
सो विष खाय चन्द्रघर आवै । अमृतकी कछु खबर न पावै ॥
पल पल करै तीर्थ अस्नाना । भीतर बाहर एक समाना ॥
अमृत रहै भुजंगिनि पासा । भीतर बाहर एक प्रकासा ॥