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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1614

( ४ )

बोधसागर

चारि करी सिंहासन जोरी । पाँचयें अचित आप अंजोरी ॥
चारि करी चारिउ परवाना । शक्ती भीतर वह अकुलाना ॥
समय-करि करि महा परिमल, बाससुबासकी खानि ।
तेज करी जो प्रगट भइ, तामहँ आइ समानि ॥

चौपाई

पुरुष अचित चिन्ता जब कीन्हा । उपज्यो सुरति शब्दको चीन्हा ॥
रहे गुप्त प्रकट भई काया । श्वासा सार शब्द निरमाया ॥
शब्दहिते है पुरुष अस्थूला । शब्दहि मय है सबको मूला ॥
शब्दहिते बहु शब्द उचारा । शब्द शब्द भया उजियारा ॥
शब्दहिते भव सकल पसारा । सोइ शब्द जिवके रखवारा ॥
प्रथमशब्द भया अनुसार । नीहतत्त्व एक कमल सुधारा ॥
नीहतत्त्वपर आसन कीन्हा । रचना रची सकल तब लीन्हौ ॥
रच्यौ पुहुप द्वीप मनिभारी । सहस्र अठासी द्वीप सुधारी ॥
अक्षै वृक्ष एक राशि बनाई । अग्रवास तहाँ रही समाई ॥
समय-पेड़ पात निज फूल महँ, प्रगटी बास अनूप ।
पारस निहतत्त्वहि पुरुष, सुरति हंसको रूप ॥

चौपाई

जब पारस सुरति भये स्थाना । अगर प्रताप निमिष उरआना ॥
पुरुष प्रसन्न नाम उच्चार । श्वासापर सब रचनि सुधारा ॥
श्वासा सार शब्द गुञ्जारा । पांच अमीको भयो विस्तारा ॥
पांच अमीको जो विस्तारा । ताहि अमी सब लोक सुधारा ॥
श्वासा पुहुप अगरकी खानी । सोरह सूनु भये उत्पानी ॥
पांच अमी साहबके अंगा । पांच तत्त्व समरत्थ प्रसन्न ॥
श्वासा स्नेह सबै उपजाया । बानी बानी वरन बनाया ॥
सत्यलोक सबही को मूला । भयऊ सत्य सो सब अस्थूला ॥