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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1613

श्वसगुआर

( ३ )

कहौ लोक कर प्रकट विचारा । जहाँलौ दीपहिं कर विस्तारा ॥
बरनौ द्वीप गुप्त अनुसारा । बरनौ जहाँ लगिसकल पसारा ॥
बरनौ सोरह सुतकर भाऊ । तीन शक्ति कैसे निरमाऊ ॥
पुरुष श्वास जेता अनुसारा । ताकर कहां सकल विस्तारा ॥
केहि विधि सोरह सुत प्रकाशा । केहि केहि कहाँ रही वासा ॥
कहाँ विस्तारि सकल अस्थाना । सत्यलोक और यमके थाना ॥
कैसे आदि अन्त प्रभु कीन्हा । कैसे रचा देहकर चीन्हा ॥
कैसे भये निरंजन राया । कैसे तीन लोक निरमाया ॥
कैसे उपजन विनशन कीन्हा । काह जानि बाजीयम दीन्हा ॥
कैसे इन्द्री देह बनाई । कैसे जीव परा वसि आई ॥
कैसे जीव अपनपौ दरसे । कैसे जीव पुरुष पग परसे ॥

समय-काया मध्ये श्वास है, श्वासा मध्ये सार ।

सार शब्द विचारिके, साहब कहो सुधार ॥

सतगुरु वचन चौपाई

धर्मदास जो पूछेउ आई । आदि अन्त सब कहां बुझाई ॥
कहां लोक लोककी बानी । कहां पुरुष सुतकी उत्पानी ॥
कहां संदेश दया करि तोही । सुक्ति जान जो पूछेउ मोही ॥
सुनहुँ सन्देश आदि निरबाना । जाके सुनत काल छे माना ॥
सुमिरहु आदिपुरुष दरबारा । सुमिरत आप हंस होय पारा ॥

समय-तीनलोकके भीतरे, रोकि रह्यो यमद्वार ।

वेद शास्त्र अगुवा कियो, मोह्यो सब संसार ॥

चौपाई

धर्मदास चित चेतहु जानी । कहां बुझाय अगरकी बानी ॥
पुरुष अजावन रहा जो देहा । तत्त्व बिहीन सुरति सनेहा ॥

१-कहाँ बुझाइ भेद समुझाई ।