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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1593

कमालबोध

( ५ )

इनकूँ तजि आगे कहँ जाओ । चार मुकाम लाहूत सो भाओ ॥
दीन इस्लाम असल दरसायो । सोतुम छोड़ि कहँ भटका खायो ॥
दीन दुनीके तुम सरदारा । कैसे मेटचो दीन तुम्हारा ॥
खुदाके अहदी काजी कहावैं । दीन इसलामको राह बतावैं ॥
दीन इसलाम असल है भाई । और सबे जग कुफर चलाई ॥

सिकन्दर वचन

मुनत सिकन्दर उत्तर दीन्हा । सबको मन अचरज असभीना ॥
भूले काजी भूले मुलाना । तिनहू भूले लाये फरमाना ॥
दीनका घर दूर है भाई । बिन जाने तुम असल ठहराई ॥
किसने विहिस्त बैकुण्ठ बनाया । दीनका असल किसने फरमाया ॥
दोहा-काजी मुछा भूलिया, भरमें सकल जहान ।
मुहम्मद भूले संदेशसे, सोई लाये फरमान ॥

चौपाई

एते सतगुरु दिल्ली आये । शाहसिकन्दर बहुत सुखपाये ॥
जमुना बिच है महल सुबारक । बैठे पीर जहाँ होइके फारक ॥
काजी मुछाको लिये बुलाये । शेखतकी तुरत चलि आये ॥

शेखतकी वचन

कहशेखतकी जुलम तुम कीना । मुरीद हमार फिरायके लीन्हा ॥
काह कियो सुनो मति धीरा । जुलम किया तुम दास कबीरा ॥
कौन इलम शाइको दिखलायी । कौन सुधि तुम नाम सुनायी ॥

कबीर वचन

मियाँ हम इलम फकीरी बोलेँ । समरथ नाम लिये जग डोलेँ ॥
हम दुवैश हैं दर्प दिवाना । सतकी चाल चलेँ जग जाना ॥

काजीमुल्ला वचन

निराकार जिन कुरान बखाना । नूर जो उत्तरयो सब जग जाना ॥
कही खुदाकी और निनारा । इसका हमको कहो विचारा ॥