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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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धर्मबोध

( १८५ )

दोहा-गृहीधर्म बड़ खटपट, तामें रहि हुशियार ।
लोक वेदकी रीति सब, करता सहित विचार ॥
जीवधात आदिक करम, करै न कबहूं भूल ।
सोइ रक्षा जीवन करे, प्रेम सहित अनुकूल ॥
वाणी अप्रिय कहै नहीं, कहै सबन उपकार ।
ठहरे पद बोधित गुरु, लावे भक्ति गोहार ॥
चारि खान बहु जीयरहि, दुखदाई जो होय ।
जुरे तो रक्षे जीव कहैं, अस कह रहे चुप सोय ॥
गुरु साधुहिं सन्मानई, मिथ्या जालहिं त्याग ।
सांच हृदय दाया सहित, निज सुख गुरु अनुराग ॥
दीन दयालको मत लखे, शिष्य स्वतः पद थीर ।
साधु गुरु सम जानिके, सबहि मन बच थीर ॥
साधुनकी जल अन्नते, वस्त्र सहित करै रच्छ ।
शक्य यथार्थ अनुक्रम, गुरुसेवी शिष्य स्वच्छ ॥
गुरु साधुपद दीर्घजग, है शिष्य सबन प्रमान ।
त्रिबिधि ताहि सेवन करे, आपु दास पद मान ॥
हे शिष्य जे दासातने, हंताते तेहि भीन ।
तेई गुरु पारख लखे, हंत कल्पना कीन ॥
तेई उत्तम पारखी, गुरुमतके अधिकार ।
हंता नाशे शिष्य जो, हंस थीर पदसार ॥
दास भाव सेवा सहित, भक्ति साधु गुरुकेर ।
यहि प्रकार हंसा वसे, सेवकको नहीं फेर ॥

निर्णय जो गुरुमुखही सूना । ताहि मनन साक्षातहु गूना ॥
प्रेम लगावे अस्ति पद माही । ठहरे गुरु पंचाइत पाही ॥

इति