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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1560

( १८४ )

बोधसागर

धन मन तन सब जायगो, रहे न जो कछु दीस ।
मूरख वृथा गवाँव सो, भक्ति भजे जगदीश ॥
महातिमिर घेरे हृदय, विषयभोग लपटान ।
सुमति न आई अजौं उर मरनकाल नियरान ॥
खाट परे तब झरखई, नयनन आवे नीर ।
तब कछु यतन बनै नहीं, तनु व्यापे मृतु पीर ॥
देखे जब यमदूतको, ठाढ भे सन्मुख आय ।
महाभयंकर भेष लखि, इत उत जीव लुकाय ॥
सकल शिथिल इन्द्री भई, रहा न कोई ओट ।
अब कहैं भागिकै जाइहौ, यमगण पकरी झोंट ॥
पुण्य भजन कीना नहीं, नहि संतनसे हेत ।
बार बार पछतात मन, चिड़िया चुन गई खेत ॥

इति गृहीधर्मका वर्णन समाप्त

अन्य गृहीधर्म वर्णन

( कबीर संग्रह )

दोहा—जो मानुष गृहधर्म युत, राखे शील विचार ।
गुरुमुख वाणी साधु सँग, मन वच सेवा सार ॥
सेवक भाव सदा रहे, अहम न आने चित्त ।
निर्णय लखे यथार्थ विधि, साधुनको कर मित्त ॥
सत्य शील दाय़ा सहित, बरते जगव्यवहार ।
गुरु साधुके आश्रित, दीन बचन उच्चार ॥
बहु संग्रह विरुष्यानके, चित्त न आवे ताहि ।
मधुकर इव सब जगतमें, घटि बढ़ि लखि बर्ताहि ॥
प्रीति सदा गुरु पारख करई । संगति साधु सदा आचरई ।
उत्तम मध्यम जग व्यवहारा । निर्णयसहित करे अनुसारा ॥