कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
कबुरमें चादर पुष्प सो पाई । ले दोनों द्वे भाग बनाई ॥
मुसलमान तेहि कबुरमें धरेऊ । हिंदू ले समाधसो करेऊ ॥
हिंदुनके कबीर चौरा है । तुरकनके कबीर रोजा है ॥
इत हिंदू सेवै गुरुदेवा । सुरशिद मुसलमान उत सेवा ॥
बालरूप जब गुरु प्रकटाना । कमलपुष्पमें कर निज थाना ॥
अंतकाल जब गयौ दुराई । गौरमें सोइ पुष्प देखलाई ॥
आदि अंत जाके नहिं देही । जन्म मरण कबहुँ नहिं तेही ॥
सकल विकार तो जो प्रभुपारा । जीवकाज तनधर संसारा ॥
सह्यौ निरादर दुःख अधिकार्ई । निज दासनको दास कहाई ॥
सो सब जीव हेतको दीसा । समरथ परमगुरु जगदीशा ॥
कबुर बीचते गये लोपाई । मथुरा नग्रमें पहुँचे जाई ॥
नीरू नीमा जोलह जोला ही । तन तजिके परकटभे ताही ॥
दोनोंको निज शब्द गहाई । जाते भवनधि फेर न आई ॥
मथुरा नग्रते बहुरि सिधाई । धर्मदास ढिग सतगुरु आई ॥
धर्मदासहि बहु भांति शिखाई । सहितदेह पुनि गयौ लोपाई ॥
महा कठिन युग कलियुग होई । शुभ करनी जिव करे न कोई ॥
यज्ञ योग जप तप व्रत दाना । भावन भक्ति विषय लपटाना ॥
तिनको काज कौन बिधि सुधरे । बिन कबीर गुरु पार न उतरे ॥
दयासिंधु तेहि पार लँघावै । सत्यकबीर कि सरन जो आवै ॥
सत्यकबीर वचन
बावन बीर कबीर कहावो । कलियुगकेर जीव सुत्तावो ॥
इति
अथ स्वसमवेदकी स्फुटवार्ता-चोपाई
एकलक्ष अरु असी हजारा । पीर पयंबरको औतारा ॥
सो सब आहि निरंजन वंशा । तन धरि धरि निज पिता प्रसंशा ॥
दश औतार निरंजन केरे । राम कृष्ण सबमाहि बडेरे ॥