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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1545

वसमवेदबोध

( १६९ )

जब सतगुरुको निज तन त्यागे । कौन धर्म प्रभुको सुभ लागे ॥
हिंदू कैधौ मूसलमाना । मृत्युकर्म किहि विधिते ठाना ॥
तब कबीर तेहि उत्तर देऊ । जौ तुम लोथ हमारी लेऊ ॥
तौ अपनी कुलरीति विचारा । मृत्युकर्म कर तेहि अनुसारा ॥
पुनि गुरु बीरसिंह गृह गयऊ । राजा रानी हर्षित भयऊ ॥
चादर तानके पौढ़े जाई । भये अबोल कबीर गोसाई ॥
राजा रानी जब अस लखेऊ । बिकल भये सतगुरु तन तजेऊ ॥
रुदन करे जब राजा रानी । नग्र शोर भा लोगन जानी ॥
बिजुलीखां नृपको गुरुभाई । सुनत खबर तुरितै उठि धाई ॥
बीरसिंहसे बचन सुनावो । सतगुरु लोथ हमैं देखलावो ॥
नृप गुरुलोथ जो परगट कीन्हा । बिजुलीखां तेहि जोरसे लीना ॥
ले भाग्यौ सो गाड़ौ जाई । राय बीरसिंह तब रिसियाई ॥
लै निजु सैन संग तेहि बेला । चढे बीरसिंह राय बघेला ॥
दोनों दिशिते दल उमड़ाने । एक न कहा एकको माने ॥
जब घमसान होनेपर भयऊ । तब अकाशबानी अस कहेऊ ॥

कवित्त

अकथ कहानी तहैं बोले नभबानी सुनो, दोहु दल ज्ञानी ॥
जिव हानीमें न दीजिये । बिज्लीखां पठान कह ठाढे हो पठान ॥
पीर, सिंहजी बघेल दहपेल मति कीजिये ॥ हाड चाम देह ॥
जन्म मरन न पीर ऐसो, साहिब कबीर सत्य बातको पती-
जिये । कबुर खुदाय नहिं लोथ कहुँ पाय कछु, तहैं दरसाय
दोऊ भाग करि लीजिये ॥

बोपाई

यह सुनि दोनों रह ठहराई । तब चलिके सो कबुर खुदाई ॥
अस अचरज तहैं देख्यो जाई । कतहुँ लोथ गुरु दधि न आई ॥