कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
सातो नरक केर व्यौहारा । भिन्न भेद पीडा अधिकारा ॥
महादुःख नारकहि बनाई । आयू परम दीर्घ जिन पाई ॥
दोहा—सुई अग्नि भरि मृत्तिका, नरकसे महि जौ आय ।
ताकी अति दुर्गंधते, सब तरु पशु मरिजाय ॥ इति ॥
अथ प्रलय वर्णन—चौपाई
प्रलयके प्रथम इन्द्र महि आवै । जोड़े जोड़े जिव ले जावै ॥
वर्गमें सबकी जतन कराई । जबलौ प्रलय पूर्ण ना पाई ॥
निज विमानमें सब जिव धारी । स्वर्ग दिशा जब इन्द्र सिधारी ॥
ताके पीछे परलय आवै । जीव जन्तु सबही विनशावै ॥
अग्निवाषि पुनि जल बरसाई । जीवबीज नहिं कतहूँ पाई ॥
पूर्ण प्रलय होय हरिजाई । जीव इन्द्र गहिमहि पुनि आई ॥
ताते पुनि जग उत्पति होई । एकते बहुरि अनेकन सोई ॥
कबहुँ न होय बीजको नाशा । जक्त अनादि स्वतह परकाशा ॥
क्रमहीक्रम फिर बढै विभूती । सर्व पदार्थ पृथिव प्रसूती ॥
इति प्रलय
अथ स्फुटवार्ता—चौपाई
षटप्रकारकी अस्थि जो कहेऊ । वज्रशरीर प्रथम जिव गहेऊ ॥
वज्रको हाड शीघ्र किमि गलई । कहुँ कहुँ भूमें अजौ न टलई ॥
यूरूप नर जहँ तहँ चलि जावै । वज्र हाड जिव जंतुको पावै ॥
सो निजु मन ऐसे अनुपानो । हाड परा चिरने पथरानो ॥
ताको मर्म न जाने सोई । वज्रहाड जिव प्रथम गहोई ॥
भीम शरीर समस्त वज्र रह । दुयोधन तन अर्ध वज्र कह ॥
लेखा ताहि काल अस रहेऊ । कोइ वज्रकाइ घटि तिहि कहेऊ ॥
ताके प्रथम कठिन सर्वगा । हनुमान आदिक बजरंगा ॥
चिरंजीव जीवे चिरकाल । गहि तन वज्र दोय दुखटाला ॥
इति श्रीजैनधर्म