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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1429

जैनधर्मबोध

( ५३ )

आयू कर्म बहुरि कहो, नाम कर्म पुनि भाष ।
गोत कर्म अंतराय कर्म, बरनौ तिनकी शास्त्र ॥
कर्म एकही जानिये, आठभांति सो दीस ।
प्रकृत जैन बानी कहै, एक सौ अरतालीस ॥

इति

अथ ज्ञानावर्नी कर्मकी पंच प्रकृति वर्णन--चौपाई

मति ज्ञानावर्नी जो कर्मा । सो आवरि राख्यो मतिधर्मा ॥
श्रुति ज्ञानी वरनी जब होई । शुभश्रुति ज्ञान फुरे नहिं कोई ॥
औध ज्ञान आवर्नी जबही । औध ज्ञान हिय होय न तबही ॥
मन पर्जय अबरन उगि आवै । सो मन पर्जय ज्ञान छपावै ॥
प्रकटे केवल ज्ञाना वरनी । केवल ज्ञान गोप तिह करनी ॥
मतिश्रुति औधअरुमनपरजाई । केवल ज्ञान पंच विधि गाई ॥
मति ज्ञान सो नाम बताई । मति बुधिते जेती चतुराई ॥
कारीगरी अरु गुन गन जेते । मति ज्ञान करि ल्हिये तेते ॥
द्वितिये श्रुति ज्ञानजिहि कहई । सर्व शास्त्र मुख पाठ जो रहई ॥
तीन काल देखे श्रुति द्वारा । जाने सकल अचार विचारा ॥
श्रुति केवल ज्ञानी कह सोई । पूरन जो श्रुति ज्ञान ते होई ॥
श्रुतिके बली जो पंडित पूरा । श्रुति द्वारे संशय कर दूरा ॥
तृतिये औध ज्ञान जब होई । मनकी बात जाने सब सोई ॥
जाके मनमें जो कछु भासा । सब औधते होय प्रकाशा ॥
चौथे कह मन परजय ज्ञाना । जो मनकी परजायको जाना ॥
जहाँ जहाँ मन छन २ करदौरा । जो कछु फुरै जाय जिहि ठौरा ॥
मन परजय सो सबही जानो । सूक्ष्म गति मन कछु नदुरानो ॥
पंचम केवल ज्ञान कहावै । ताकी उदय मुक्ति जिव पावै ॥
केवल ज्ञान जो हृदय प्रकाशा । सकल भर्म भयकेर विनाशा ॥