कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
अथ नौ प्रतिनारायणके नाम
दोहा-अश्वग्रीव तारक मेरक, मधु निशुम्भ प्रहलाद ।
बलि रावण जरासंध नव, प्रतिनारायण बाद ॥
इति
अथ तिरसठ शलाकापुरुषके नाम-चौपाई
तिरसठ पुरुष शलाका येही । जन जान अति उत्तम तेही ॥
मात पिता तिरथंकर करो । अरतालीस जीव सो हेरो ॥
चौबिस कामदेव नौ नारद । चौदह कुलकर बुद्धिविशारद ॥
ग्यारह रुद्र यक सौ उनहतर । मुक्तिपात्र अवश्य येते नर ॥
इतने इतर और अधिकाई । केवल ज्ञान गहि मुक्त कहाई ॥
अथ जैनशास्त्र संख्या प्रमाण-चौपाई
जैन शास्त्र संख्या परमाना । ऐसे ताको सुनो बखाना ॥
बत्तिस पद सब शास्त्र कहावै । ऐसे ताको लेख लगावै ॥
प्रतिपद ढाई सौ मन स्याही । यक पद पूरन लिखिये ताही ॥
यक चावल कजल जौं लीजै । यकश्लोक पूरण तिहि कीजै ॥
बत्तिस पद यह लेख लगाई । सर्व शास्त्र ताते लिखि पाई ॥
कजल आठ सहस मन लागे । केवल वैन जैनपति जागे ॥
केवल वानी जैनको जोई । अंथ प्रमाणिक इनमें सोई ॥
अथ अष्टकर्म विधान वर्णन
दोहा-अष्टकर्म जो जैन कह, ताके बंधन जीव ।
भवसागर भोगे सदा, पावे नहिं निजु पीव ॥
ज्ञानी बरनी प्रथम कह, दर्शना बरनी फेर ।
बहुरि बेदनी जानिये, महा मोह पुनि टेर ॥