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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1401

आत्मबोध

( २५ )

कहैं कबीर सोइपार कैसे लहै, कालकी चोटकूँ फेरि खाता ॥
अंध ज्ञानवैरागअरु भक्तिको कहत है, रहसतोएकनहिंहाथ आवै ।
फिरत कडछी जैसे पाकके बीचमें, रसके स्वादको नाहिं पावै ॥
ज्योटिलीको देखिकरिदिछीकीनकलकहै, तासुकीनकलकोइ और ठाने ।
कहैं कबीर कोइ भेद पावै नहीं, भेद तो देखने द्वार जानै ॥
वेद वेदांत अरु कथत भागवतको, अर्थ अनुभवतणांकरतनीका ।
ज्ञानवैराग अरु भक्तिको कहत है, रहतर नामविना सबै फीका ॥
कामिनीकुबुद्धिउरमांहिकांटाघना एकनामनिर्वाणउरनाहिंटीका ।
कहैं कबीर सो पार कैसे लहै, कनक अरु कामिनी हाथबीका ॥
रांडिया खेलेमें रांडिया होयगा, खेले अवधूतका होय न्यारा ।
खान अरु पान वशी ते जीवहै, कहो क्यों होय भौ सिन्धु पारा ॥
चालताजमीपैअरुकहत आकाशका, कहोक्योंमानिहैसाधु सोई ।
कहैं कबीर यह संतका शब्दहै, कहै ज्यों रहै अवधूत सोई ॥
कहत वैराग अरुराग छूटै नहीं, पांचसों राचिकरिजीव खोया ।
इन्द्रियास्वार्थी शब्दअनुभव कथै, पदसो बांधिकरिजीव खोया ॥
नाम निर्गुण किहै रहत है गुणमई, शिष्य शास्त्रातणी भूख भारी ।
कहैं कबीर जब काल गढ़ घेरिहै, कौन गति होयगी जीव थारी ॥
राग अरु द्वेष की चौतरा साजि करि, तासुके ऊपरे जीव बैठा ।
झूठको थापिकरि सांचको उत्थपै, अज्ञानकी केन्द्र गरकपैठा ॥
रागअरु द्वेषका चौतरा खोदिये, ज्ञानकूदाल सोढाह भाई ।
कहैं कबीर तब साधु पद पाइये, मुक्तिके महलमें सहज जाई ॥
पांच अरु तीनको करत निषेद नरमहलचौथा तणी बात गावै ।
रहत रजमा बिनाकहतर झूठी सबै, होय अवधूत तो कहत भावै ॥
जेनाम रसना रटैपापपलमें कटै, कनक अरुकामिनी त्याग दोई ।
कामअरु क्रोधमदलोभ को त्यागि नर, कहैंकबीरयोंसहज सोई ॥