कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1400, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( २४ )
बोधसागर
और डहकायकरिआप डहका फिरै,जीवका भलाकयौहोय भाई ।
कहैं कबीर नरस्वांगकोपहरिकरि, साधुकी राह नहिं हाथ आई ॥
संत पूरा मिलै जीवको तारि है, वासना जीवकी खोवे ।
नाम उपदेश अरुभर्मनादूरिकरि, पाचको पलटि भवपार होवै ॥
मिलै अध बेसरा इन्द्रिया स्वार्थी, जीवबहकायकरि टूकरखावै ।
आपुभव सिन्धु औ जीवको लेवहै, कहैं कबीर नहिं पार पावै ॥
योगकी युक्ति तौ मूठ समझैनहीं, स्वांगकोपहरिकरि सिद्धहूआ ।
ज्ञान वैराग अरु दया जाना नहीं, वासना बीज तहां जाय मूआ ॥
मान मस्तान अरुद्रेष माहीघना, आंठि अभिमानकी नाहिं छूटी ।
कहैं कबीर सो पार कैसे लहै, माहिली वाहिली चारि फूटी ॥
अंधसाधुपदछाडिसंसारमेंघीसपडा, कौंडियॉरुयालमोरतनखोया ।
जन्म अरुमरनकादुखसिरपरसहा, योंमोहकेमहलमें जीव सोया ॥
अल्पही भोग अरु अल्पही जीवना, ज्ञानविचार कछु नाहिं कीया ।
कहैं कबीर यों बूडि विषधारमें, छाडि सुखसारको जहरपीया ॥
प्रेमके पंथको भूलि उलटा पडा, बँवनको खायकर फूलि बैठा ।
गयो वैराग अरु वन्दगी नाबन्यो, कर्मके कीचमें गला हैठा ॥
नरकमें जानकी टेक गाढ़ी गही, दोष निदौषको धार माही ।
कहैं कबीर सो सुखसार कैसे लहै, छांडिसुखसारकूं जहरखाई ॥
ताहि उगालकरि फेरले खात है, देख मनकूकरा पडत भारी ।
शब्द अरुचेसला कानिमाने नहीं शर्म सूझै नहीं होत ख्वारी ॥
जहाँका ऊपजा तहां फिरि आग्या, मायकारूप फिरिनारिकीया ।
काल अकरालकी चोट छूटै नहीं, कहैं कबीर धिरकार जीया ॥
नामनिज नीरविन पीर पावै नहीं, पाचसोरॉंचिकरिसांचखोया ।
शहदकी बुन्दके रस प्रवसभया, यो मोहके महलमें जीवसोया ॥
कामअरु कोथ मदलोभमाहीघना, कनक अरुकामिनीरंगराता ।