कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1384, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( ८ )
बोधसागर
कहै सब साधु अगाध मैं क्या कहूँ, बिना निर्वेद नहिँ दृष्टि आवे।
कहैं कबीर यह खेल बारीक है, बिना गुरु देव कहो कौन पावै ॥
देव निर्वाण तहाँ बाण लागे नहीं, सकल कला सिरें काल देवा ।
शेष शिव बिरंचि तिस पार पावे नहीं, चन्द अरु सूर फिर करै सेवा ॥
तेज क्षिति पवन जल रहत आज्ञा सही, निगमहू कहत नहिँ पार आवै।
कहत अगाध २ सब संत जन, दास कबीर तहँ शीस नावै ॥
सांचा साइयां एकतू और दूजा नहीं, दृष्टि दीखे तेती सकल माया।
गुणमयी कृत प्रपंच सब बिनसिहें, थिर नहीं दीखता रहन पाया ॥
घट अरु मठ महदादि थिर ना रहै, रहैगा आदि सोइ अंत नाई ।
कहैं कबीर मैं तासुकी बन्दगी, एक भरपूर सर्वज्ञ साई ॥
देवरे देवरे देव निर्वाण है, कालका बाण तहाँ नाहिँ लागै ।
चन्द औ सूर प्रकाश करि सकै, करत परपंच कै रहै आगै ॥
विश्व आधार अरु आप निर्धार है, लहै कोइ संत गुरु ज्ञान जागै।
कहैं कबीर विष धार सो ना बहै, जन्म अरु मरणका भर्म भागै ॥
खिरे सो थिर नहीं थिर नहीं खिरत है, आनंद अमरानंद अलख योगी।
सकल के माहिँ अरु रहत अतीत होय, तीन गुन पांचरस सकल भोगी ॥
खेल अगाध कछु कहत आवे नहीं, खेल को देखि करि मगन हुआ ।
कहैं कबीर यह सैन गुंगातणी, जानिहै संत सो नाहिँ जूआ ॥
जागता २ जागकर देखिया सोवता सोवता सुख सोया ।
खोवता खोवता खोय सारा दिया, रहासो कहन मैं नाहिँ आया ॥
अर्थ अगाध कोई साध भल पाइहै, जासुके खेल प्रकट होई ।
कहैं कबीर यह खेल प्रतीतका, बिना प्रतीत क्या कहै कोई ॥
रैन दिन संत यूँ सोवता देखिये, संसारकी तरफसूँ पीठ दीया ।
मन अरु पवन फिर फूट चालै नहीं, चन्द अरु सूर कूँ समकीया ॥
टकटकी चन्द चकोरकी रहत है, सुरति अरु निरतिका तार बाजे ।