कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1383, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंआत्मबोध
( ७ )
राव सो रंक करि रंक राजा करै,अविगतिकी गति कहो कौनपाई॥
पलएकमें भाजिकरि फिर रचनकरै,समरत्थकीबाजिया कौनजाने।
कहैं कबीर यह खेल समरत्थका,होय साक्षी तिहिको सुख माने ॥
रजाय तुम्हारी साईयां करोसो होगया,आपकीरजाकहो कौनमेटै ।
पल एकके बीचमें दरिआवदहपेलता,फिरि पलएकमहँलेस मेटै ॥
उलटका पुलट अरु पुलटका उलट है,आपका खेल कहो कौनपावै ।
पल एकमें भाजि करिफिरि रचनाकरै, कहैं कबीर नहीं हारिआवै॥
दृष्टि औ सुष्टि नहिं ज्ञान गुष्टि तहाँ,सकलप्रकाश करिरहै न्यारा ।
सकलके माँहिअरुसकलकी जानहै,आदिअरुअन्तनहिं मध्यपारा॥
परम प्रकाश आकाशवत जानिये, बाहिरा भीतरा एक साई ।
कहैं कबीर यह खेल भरपूर है, आवना जावना फेरि नाई ॥
खेल अवधूतका महा अद्वैत है, द्वैत प्रपंचका लेश नाही ।
गुणमयीकृत सब कालकी डाटमें,शेषशिवविरंचि अरु विष्णु ताही॥
रहै निर्धारि आकार थिर ना रहै, विश्व संसार सब अघर माही ।
कहैं कबीर यह खेल निश्चे किया,जन्म अरु मरण तिस भर्म नाही॥
देख अवधूतके ज्ञानका घेसला, कालके जालको दूरि तोडै ।
गुणमई कृतको काटि पयमाल करि,पांच पचीसको पलटि मोडै॥
राग अरु द्वेषकी भीतिको ढाय करि, भर्मके कोटको फोर फोडै ।
कहैं कबीर यों प्रेम प्रकाश करि,सुरति अरु निरतिका तार जोडै॥
सैलियां बाकियां देख अवधूतकी, जीवता मरै सो भक्ति पाही ।
तीर खुरसानका बहत तीखा बहै,लगे उर माँहि गद टिकैनाही॥
राजसा माहि गद बहु ऊपजे, तामसा माँहि अहंकार भाई ।
कहैं कबीर तहाँ शांति कहैं पाइये, जीवकी वृत्तिको ठीक ठाई ॥
दृष्टि अवधूतका दुष्ट नहिं सहि सके,दुष्टको द्वैतकी दृष्टि भासै ।
परम प्रकाशका भेद पावे नहीं, इन्द्रियां द्वारके रहे आसै ॥