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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1372

( २२२ )

बोधसागर

साखी-श्वासा मद्धे तत्त्व है, लगन तत्त्वके माहिं ।
योगांजन पहिचानि हैं, ज्ञानीजानत नाहिं ॥

प्रथमहि पृथीतत्त्वको पाई । तामें जगपति लगन मिलाई ॥
अष्टोदिशा गवन तब कीजै । सकलबिचार छांड़ तब दीजै ॥
अष्ट सिद्ध नव निद्धि कहाई । सो तो तहां सहजमों पाई ॥
मनमों इच्छा जाकी होई । सुफल कामना पावै सोई ॥
कोटिन कार्य सिद्धता पावै । सर्व जीत होय घर को आवै ॥
मनमों हार न आवै कबही । ऐसी लगन बिचारे जबही ॥
सुरको सगुन एक गुन जानो । यह मत विश्वावीश बखानो ॥
ताको भेद मैं दीन्ह बताई । सबे सिद्धको मूल लखाई ॥

साखी-जैतिक कारज जगतमों, चर औ अचर विचार ।
ते सब जानो सुफल है, कोट सिद्धको सार ॥

जैमुन लगन कहौं समुझाई । ताकर फल मैं देउँ बताई ॥
जलके पृथीतत्त्व दोय पावै । तामें जैमुन लगन पिलावै ॥
तबही ज्ञान करे जो कोई । सबै सिद्धता पावै सोई ॥
कब हूं न होवे तनमों पीरा । जीते युद्ध महा रणधीरा ॥
मनवांछित फल पावे सोई । जितने कार्य जगतमों होई ॥
एक सिद्धकी कौन चलावे । कोटिन सिद्ध तामें फल पावे ॥

साखी-नौ ग्रह घातिक दरसके, और योगिनी काल ।
लगन तत्त्व लखके चले, कारज होय ततकाल ॥
सुर औ तत्त्व बिचारके, तामह जैमुन होय ।
जौन वचन मुखसों कहे, सिद्ध जानिये सोय ॥

तीसर लगनको भेद बताऊँ । ताको अर्थ तब वर्ण सुनाऊँ ॥
जलके पृथी तत्त्व एक पावै । तामह लगन केतुकी आवै ॥
ताके जोर कार्यको जाई । सोतो कार्य मिले उठ धाई ॥