कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चसुद
( २२१ )
तबही सुफल कामना होई । पहुँचे हंस लोकको सोई ॥
अजर हिरंमर देही पावे । योनी संकट बहुर न आवे ॥
साखी-जीव मुक्तको मंत्र यह, बणीं अंक छपाय ।
ताको जप मनमें करे, ताको काल न खाय ॥
सुक्ति वचन-चौपाई
हो सतगुरु तुम मंत्र सुनायो । मेरो हृदैं सांच अब आयो ॥
अब गुरु कहो लगनकी वानी । श्वासा लगन कैसे पहिचानी ॥
अलख मता है ताको साई । ताको भेद कहो समुझाई ॥
कैसो रंग लगनको होई । कारण भेद कहो प्रभु सोई ॥
साखी-जैमुन जगपत केतुकी, औ व्यालिन पहिचानी ।
गुण प्रकाश लक्षण सहित, सतगुरु कहो बखानी ॥
योगजीत वचन
सुक्ति सुनो लगन बेवहारा । तुमसों भेद सब कहों बिचारा ॥
प्रथमे श्वासा ध्यान लगावै । ताको रंग हृष्टमें आवे ॥
पीतवर्ण तहां देखे जबहीं । अति दुलास मन आवे तबहीं ॥
उपजे सुख पीत रंग जानी । जगपति लगन पुन ताहि बखानी ॥
अरु पुन श्वेतवर्ण लख आई । अस्थिर समाध रहे ठहराई ॥
उपजे सुख प्रेम भक्त अधिकारी । दया लीन तब सुतं निहारी ॥
श्वेतभाव जब मनमें आवे । सोई जैमुन लगन कहावै ॥
बहुर ध्यान धर देखे जाई । श्वासा पवन श्वेत लख जाई ॥
जल आकार पुन भासों जबहीं । उठे सुगंध श्वासमें तबहीं ॥
ध्यान बीच आकार न जाने । कैतुकी लगन ताहि पहिचाने ॥
बहुर ध्यान धर देखे जाई । अरुणश्याम तहाँ भूमि लखाई ॥
अहंकार मन शठता आवे । सुख नाश होय दुःख उपजावे ॥
इतना भावही देखे जाई । व्याल लगन कहावै भाई ॥