कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमुद्रा
( २१९ )
प्रथमे सोहंग पुर्ष बखाना । तामे अलख ब्रह्म पहिचाना ॥
निः अक्षर निःतत्त्व अधारा । तामह अर्ध पवन हंकारा ॥
सोहंग कार गगन अस्थाना । तामह पूरण ब्रह्म समाना ॥
तामह नाम निगम्य है सारा । सोहै सबको सिरजन हारा ॥
तासों हंस लीन होय जाई । निःअशरमों रहे समाई ॥
सिंधुबुन्द तहाँ एके होई । दुनियाँभाव नाश होय सोई ॥
सोनिज अजपा है निर्वाना । आतम हंसा तहाँ समाना ॥
वोहंग कोहंग जोहंग नामा । सोहंग सुर्त निरन्तर धामा ॥
सोई नाम जीव रखवारा । अमी अन्न बिहंग विचारा ॥
आगे आदिनाम हम भाखा । ताकर नाम सो गुप्तहि राखा ॥
अंतर अजाप नाम सनेही । अमी सोहंग पुर्षकी देही ॥
लागी निरंजन बेहंगमतारी । अष्ट गगनकी खुर्ली किवारी ॥
दहिनो अंग पुर्ष अस्थाना । तहवाँ हंसा कीन पयाना ॥
मकतार गहि हंस उड़ाई । आगे अकह कमल दरशाई ॥
कमल अनंत पंखुरी छाजै । आदिपुर्ष जहाँ आप विराजै ॥
श्वेत सिंहासन श्वेतहि काया । श्वेतहि पुर्ष श्वेतही छाया ॥
श्वेतछत्र शिर मुकुट बिराजै । भान अनंत शोभा तहाँ लाजै ॥
श्वेत चवर शीस फहराई । भान अनंत कला वहाँ छाई ॥
ऐसे निरगुण नाम अन्नपा । महापुर्षसो आदि स्वरूपा ॥
नाम तेज बल सुमिरन पाई । महाकालते जीव छोड़ाई ॥
बहुर न होय जीवकी हानी । निश्चय सत्तपर्षको जानी ॥
यह मत निरगुण पावे कोई । जाको सतगुरु पूरा होई ॥
यह मत पाय अमर होय जाई । बहुर न जीव प्रलै तर आई ॥
सत्यनाम सतगुरु परतीती । हंसा चले तब भौजल जीती ॥
है सुकृत तुम संत सुजाना । तुमसों कहीं मैं योग ठिकाना ॥