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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1368

( २१८ )

बोधसागर

जबही हंसलोक नजिकाई । तबही देह हिरंमर पाई ॥
षोडश भान देह उजियारी । ऐसा रूप हंस तब धारी ॥
हंसा तबै तहाँ चल जाई । जक्षत पुर्ष तहाँ आप रहाई ॥
कमल अनंत परबूरी जानो । आदिपुर्ष जहाँ आसन ठानो ॥
पोहोप दीप तेहि नाम बखाना । सत्तपुर्ष कीन्हो अस्थाना ॥
सोई नाम निर्गम्य बखानी । अनंत नाम ताते प्रमानी ॥
ताको नाम हंस जो पाई । जीवन मुक्त हंस होय जाई ॥
सोई नाम जो सुमिरण करई । धिन तप भक्ति सो प्राणी तरई ॥
योजन अनंत लोक विस्तारा । आदिपुर्ष तहाँ करहि विहारा ॥
श्वेतहि वर्ण पुर्षकी काया । संपुट कमल देखिये छाया ॥
पुष्पहि धरनी तहाँ रहाई । जहाँ हंस सब राज कराई ॥
चारकरी सिंहासन जोरा । तहवां मध्य पुर्ष अंजोरा ॥
जगमग जोत अगिन उजियारा । बर्णत बने न अपरम्पारा ॥
हंस अनंतन बैठे तहवाँ । माथे मुकुट छत्रमणि जहवाँ ॥
षोडशभान हंस उजियारा । देह हिरंमर सो विस्तारा ॥
चंद न सूर दिवस नहिं राती । वर्ग अवर्णन जात नहिं पांती ॥
माया कालकी तहाँ न छाया । अजर अमर हंसनकी काया ॥
पुरुषनाम अस्थान बतायो । आदिनामकी संध लखायो ॥
सोई नाम हंस जो पावै । योनी संकट बहुर न आवै ॥

साखी—आदि अमर अक्षत हैं, अविगत अविचल धाम ।

आदिपुरुष सो जानिये, रूप निहगम्भी नाम ॥

आदनाम मैं परकट भाषा । वणों मूल फूल फल साखा ॥
और नाम एक पुर्ष बखाना । विहंग नाम तासुको जाना ॥
सोतो रहे पुरुष दरबारा । ताको भेद मैं कहाँ विचारा ॥
अजपा सिद्धि देउँ बतलाई । ताको भेद कहाँ समझाई ॥