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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1355

पञ्चमुद्रा

( २०५ )

ब्रह्मजीव नहीं तत्त्वकी छाया । नहिं तहैं दशइंद्री निरमाया ॥
काम क्रोध मद लोभ न कोई । तहवां हर्ष सोग नहिं दोई ॥
नादबिंदको तहां न पानी । नहीं तहैं सृष्टि चौरासी जानी ॥
चंद सूर तारागण नाही । नहीं तहैं दिवस रैनकी छाहीं ॥
ज्ञान ध्यानको तहां न लेषा । पाप पुण्य तहवां नहीं देषा ॥
डार मूल तहां वृक्ष न छाया । जीव सीव तहांकालन काया ॥
पवन न पानी पुरुष न नारी । हृद अनहृद तहां नहीं विचारी ॥
यंत्र मंत्र तहां दरद न धोखा । नर्क स्वर्ग संशय नहिं शोका ॥
श्वेत पीत सबज नहीं लाला । मोर सोर नहीं वृद्ध ना बाला ॥
पिंड ब्रह्मांडको तहां न लेखा । लोक अलोक तहां नहीं देखा ॥
मन औ वृद्ध पवन नहीं जाना । रचना बाहिरसो अस्थाना ॥
आदि पुरुषको है तहां थाना । यह चरित्र एकौ नहीं जाना ॥
हे सुकृत मैं तुम्है लखावा । निरगुणरूप वर्ण दर्शावा ॥

सुकृत वचन

हो सतगुरु तुम आगम भाषा । वर्णैउ पेड़ पत्र अरु शाखा ॥
अब तुम कहो पुरुषको रूप । कैसी कला हे कौन स्वरूपा ॥
लोक प्रकाशको भेद बतावो । लोक प्रमान मोहि समुझावो ॥
यामैं कछु न राखो गोई । है समर्थ अब भाषो सोई ॥

सार्वी—आदि पुरुषके रूपको, कहो भेद समुझाय ।

लोक प्रमान मरजाद सब सो मोहि देहु बताय ॥

योगजीत वचन—चौपाई

प्रथम पुरुषको रूप बखानो । सो तुम रूप हृदयमें आनो ॥
पुर्षअंग छबि वर्ण सुनाई । गुप्त भेद मैं तोहि लखाई ॥
पुरुष शोभा अगम अपारा । ताको को अब बरणे पारा ॥
कोट अनन्त योजन लौ काया । कहाँ लग कहों तासुकी छाया ॥