सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1354, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1354

( २०४ )

बोधसागर

ताको उग्रलोक है भाई । तहां अंकूर उदित रहाई ॥
अंकूरलोकते आगे जाना । इक्ष नाम तहां पुर्ष बखाना ॥
चार असंख योजन प्रमानी । इक्ष्या पुर्ष तहां रजधानी ॥
सोई पुर्ष कर्ता होयं आवा । आदपुर्षके अंश कहावा ॥
प्रथम पुर्षकी इक्ष्या आई । ताते इक्ष्या नाम कहाई ॥
ताहि पुर्षको कहां ठिकाना । है सुकित तुम सत्तही माना ॥
इक्ष्या आगे लोक बखानो । सोतो अंश पुर्षको जानो ॥
नौ नील एक संख बखाना । बानी नाम पुर्ष स्थाना ॥
पुर्ष प्रथम बानी उच्चार । ताते नाम सर्व आकारा ॥
ताहि पुर्षको भेद बताई । एतो आद पुर्ष हैं भाई ॥
बानी नामते आगे जाना । सहजनाम तहां पुर्ष बखाना ॥
दशलाख एकशंख बखाना । सहज पुर्षको तहां अस्थाना ॥
तहवां सहज पुर्ष है भाई । आदिपुर्षके अंश कहाई ॥
सातपुर्ष इहांलग जाना । निरंजन अक्षर नीचे थाना ॥
अचितसौ अक्षर उपजे भाई । निरंजन अंश अक्षरते आई ॥

साखी-निरंजन और सहजलों, नौ पुर्ष प्रमान ।
आदिपुर्ष आगे कहां, जितने सब उत्पान ॥

सहज अंशलग जैतिक भाषा । सो रचना परलयतर राषा ॥
इहांलग प्रलैको प्रमाना । आगे अक्षैलोक अस्थाना ॥
सहज पुर्षते आगे जाई । आदिपुर्षको लोक दिखाई ॥
सहजते एक असंख प्रवाना । तहवां आदिपुर्ष निरबाना ॥
तहँवा प्रलैकालकी छाया । नहीं तहां कछु मोह और माया ॥
तहां न तीनों गुनका भेषा । ब्रह्मा विष्णु तहां न महेशा ॥
नहीं तहां जोत निरंजन राई । अक्षर अचित तहां नहि जाई ॥
तहां नहीं शिवशक्ती औतारा । नहीं तहां अक्षर ओकारा ॥