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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1352

( २०२ )

बोधसागर

एता योजन कहो प्रमाना । पृथ्वी अकाशको अन्तर जाना ॥
एता स्याम अंड पहिचानी । आगे और अबलोक बखानी ॥
पृथीते लक्ष योजन बंधाना । तहवां सूरज देवको अस्थाना ॥
सूरजते चन्दलोक है भाई । योजन लक्ष आगे चल जाई ॥
चन्दलोकते आगे जाना । योजन लक्ष नक्षत्र बखाना ॥
योजन लक्ष आगे चलजाई । ताके आगे भौम बताई ॥
भौमके आगे बुध अस्थाना । योजन लक्ष आगे प्रवाना ॥
बुधके आगे गुरु पहिचानो । योजन लक्षमें ताहि बखानो ॥
गुरुके आगे शुक्र बताई । योजन लक्ष कहों ठहराई ॥
शुक्रके आगे शनिको जाना । लक्ष योजन आगे पहिचाना ॥
शनिके आगे अदित बखाना । योजन लक्ष कहो प्रवाना ॥
तेहिके आगे सोम कहीजै । सोमके आगे राहु लहीजै ॥
राहु केतु लोक अस्थाना । योजन लक्ष आगे बंधाना ॥
तहाँते लक्ष योजन प्रवाना । तहवां सप्तऋषीश्वर जाना ॥
तेरह लक्ष ऋषिन सो भाई । आगे विधिको लोक बताई ॥
तहाँते लक्षयोजन बंधाना । महाविष्णु आगे पर्वाणा ॥
श्रीनारायण बैठे जहँवा । सूवा ऊपर पालंग तहँवा ॥
पग अगुष्ट मुख दीन्हों सोई । बालरूप तहाँ कीन्हों जोई ॥
तहाँते गौलोक कहावे भाई । राधा सती तहाँते आई ॥
सोई नाम अर्चित कहावे । सच्चिदानन्द ताहि गोहरावे ॥
इहालंग सगुणरूप बतलाई । यही चारों वेदन गुन गाई ॥
आगेको कछु भेद न पाई । इहालंग सबही मिल गोहराई ॥
तैंतिसकोट इहालंग गावै । आगेका कछु भेद न पावै ॥
चारमुक्तका कहे बखाना । यही रूपको करे पर्वाणा ॥
बहुते तेज उहालंग जाई । प्रले समै नाश होय भाई ॥