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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1351

पञ्चमुद्रा

( २०१ )

चौपाई

अब मैं कहौ लोककी बानी । निरगुण भेद कहौ बिलछानी ॥
प्रथमहि कुम्भ रूप औतारा । पीछे सकल सृष्टि विस्तारा ॥
योजनकोट एक सुख कहिये । कोट पचास पीठ तेहि लहिये ॥
एक कोटको मस्तक जाना । कोटकोटके अन्त बखाना ॥
एक कोटपर नेत्र बताई । सोरा माथ चौसठ हाथ पाई ॥
पृथी ते दून कुम्भ है भाई । पूरबदिशि सुख बरन भुनाई ॥
उंचास कोट पृथ्वी पर्वाणा । ताके तरे कुम्भ अस्थाना ॥
बहुर अष्ट दिगपाल बखाना । कुम्भ पीठपर है अस्थाना ॥
चौसठ पुंडरीक तहां कहिये । बावन लक्षको मस्तक लहिये ॥
छयकोट ऊचे प्रमाना । कुम्भ पीठपर कीन्हों थाना ॥
ऊपर कुम्भ शेषको जाना । पंद्रह कोट ताहि प्रवाना ॥
तहां वासुककी बैठक कहिये । और वराहु तासुपर लहिये ॥
ताकी डाढ़ पृथी ठहराई । राई प्रवानसो दीखे भाई ॥
पर्वत अष्टपृथी पर जाना । मध्यपृथी सुमेर बखाना ॥
सोरह सहस्र नीचे बधाना । एता योजन तरे समाना ॥
बीस सहस्र योजन चौरासी । चार दिशा तेहि फेर रहासी ॥
चौरासी सहस्र योजन प्रवाना । इतना ऊँच सुमेर बखाना ॥
तापर चारपुरी हैं भाई । अमरपुरी पुन तहां बनाई ॥
तहां इंद्र सुखराज कराई । तीन देव अस्थान बताई ॥
तैत्तिस कोट देवता जाना । अठासी सहस्र ऋषि प्रवाना ॥
तहां कुबेर भंडारी कहिये । अलकापुरी नामसो लहिये ॥
नौ पदुम नील अठतालिस । चौत्तिस पर्व अर्ब उनतालिस ॥
सतावन कोट कहौ प्रवाना । पैंसठ लाख कहो बंधाना ॥
पञ्चानवे सहस्र और तहां कहिये । पचास एकसो योजन लहिये ॥