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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 133

अनुरागसागर

( ६ )

छन्द

तेहि बहुत कहिसमुझावहीं, नहिं नारिसमुझतसोधनी॥
नहिं काम है धन धाम सों, कछु मोहितो ऐसीवनी॥
जग जीवना दिन चारि है, कोइ नाहिं साथी अंतको॥
यह समुझि देख्यो ऐ सखी, ताते गह्यो पदकंतको॥३॥
सोरठा-लिये कियाकरमाह, जाय सरा ऊपर चढ़ी॥
गोद लियो निज नाह, रामनाम कहते जरी॥३॥

तत्त्वानुरागी के लक्षण

धर्म । येह अनुरागी बानी । तुम तत देख कहुं बिलछानी
ऐसे जो नामहिं लौं लावे । कुलपरिवार सबहिं विसरावे॥
नारी सुतको मोह न आने । जीवनजनम सपन केरि जाने॥
जगमें जीवन थोरो भाई । अन्त समय सो नाहिं सहाई ॥
बहुत पियारि नारि जगमाहीं । मातु पितहु जाहि सर नाहीं॥
तेहि कारण नर सीस जु देही । अन्त समय सो नाहिं सनेही॥
निज स्वारथ कई रोदन करई । तुरतहि नैहरको चित धरई ॥
सुत परिजनधन सपनसनेही । सत्यनाम गहु निजमति एही॥
निजतनुसमप्रिय और न आना । सो तन संग न चलत निदाना॥

कालसे कौन छुड़ा सकता है ?

ऐसा कोइ न दीखे भाई । अन्त समयमें लेइ छुड़ाई ॥
अहै एक सो कहौं बखानी । जेहि अनुराग होय सों मानी॥
सत गुरु आहि छुड़ावन हारा । निश्चय मानो कहा हमारा ॥

सदगुरु क्या करता है ?

कालहिं जीत हंस ले जाहीं । अविचलदेश पुरुष जहाँ आहीं॥
जहाँ जाय सुख होय अपारा । बहुरि न आवै यहि संसारा ॥

नं. २ कबीरसागर २