कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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अनुरागसागर
तम मोह मोसम ज्ञान रवि, जब प्रगट हो तब सूझई॥
कहत हूं अनुरागसागर, संत कोइ कोइ बूझई ॥ २ ॥
बिना अनुराग वस्तुको पा नहीं सकते
सोरठा-कोइ इकसन्त सुजान, जो मम शब्द बिचारई॥
पावै पद निर्बान, बसत जासु अनुराग उरा॥ २ ॥
धर्मदास वचन-अनुरागीके लक्षण विषय प्रश्न
है सतगुरु विनवौं कर जोरी । यह संशय मेटो प्रभु मेरी ॥
जाके चित अनुराग समाना । ताकर कहो कवन सहिदाना॥
अनुरागी कैसे लखि परई । बिन अनुराग जीव नहिं तरई॥
सो अनुराग प्रभु मोहिं बताऊ । देई दृष्टान्त भले समझाऊ ॥
सतगुरुवचन-अनुरागीके दृष्टान्त
धर्मदास परखहु चितलाई । अनुरागी लच्छ कहुं समुझाई॥
मृगाका दृष्टान्त
जैसे मृगा नाद सुनि धावै । मगन होय व्याधा ढिग आवै ॥
चित कछु संक न आवै ताही । देत सीस सो नाहि डराही ॥
सुनि सुनि नाद सीस तिन दीन्हा । ऐसे अनुरागी कहैं चीन्हा ॥
पतंगका दृष्टान्त
औ पतंगको जैसो भाऊ । ऐसे अनुरागी उर आऊ ॥
सतीका दृष्टान्त
और लच्छ सुनियो धर्मदासा । सतगुरु शब्द करो प्रकाशा ॥
जरत नारि ज्यों भूतपति संग। तनिको जरत न मोरत अंगा ॥
तजै सुगृह धन धाम सुहेली । पिय विरहिन उठि चले अकेली ॥
सुत लै लोगन आगे कीन्हा । बहुत मोह ता कहैं पुनि कीन्हा ॥
बालक दुर्बल तोहि विनु मरिहै । घर भो सुत्र काहि विधिकरि है ॥
बहु संपति तुमरे घर अहाँ । पलट चलहु गृह अस बस कहई ॥
ताके चित कछु व्यापे नाहीं । पिय अनुराग वसे हिय माहीं ॥