सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1276, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1276

( १३६ )

बोधसागर

साखी—गुरु शिष्य एके भए, भिन्न न कबहुँ होय ।
दुर्मति दिलसो मारिकै, सुरति शब्द चित पोय ॥

धर्मदासबचन--चौपाई

धर्मदास तब बिनती कीन्हौ । चरण पकरिके विन्ती लीन्हौ ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश्वर देवा । केहिविधि उपजे सो कहि भेवा ॥
चारि मुक्तिको भेद बतावौ । सुस्थिर ज्ञान मोहि समझावौ ॥

सत्गुरु बचन

सदगुरु बचन विहसि कर बोले । मुक्ति भेद कहुँ परदा खोले ॥
आदिहि पुरुष निरञ्जन कीन्हौ । माया आदि ताहि कह दीन्हौ ॥
तिहि संयोग भये त्रिय बारी । ब्रह्मा विष्णु महेश विचारी ॥
चार मुक्तिके वे हैं राजा । पँचइ मुक्ति भिन्न उपराजा ॥
प्रथम मुक्ति सालोक बताई । मारग वाम ताहि कर आई ॥
दूजी मुक्ति समीप कहावा । निर्वाण मार्ग हो ताकहँ पावा ॥
तीसरि मुक्ति स्वरूप बखानी । अघोर मार्गही ताकर जानी ॥
चौथी मुक्ति कहिये सायोजा । सर्मग मार्ग कलमा पढ़ रोजा ॥
चारों मुक्ति निरञ्जन लीन्हौ । तिनके बसहि जीव सबकीन्हौ ॥
अब सुन पांचइ मुक्ति विचारा । धर्मदास परखो मतसारा ॥
जीवनमुक्ति दरस तब लहये । मृतकदसा होय नामहि गहिये ॥
सत्य वचन मुखसो उच्चरई । नाम सार हृदये महाँ धरई ॥
नियम धर्म षट्कर्म अचारा । त्रिगुण फंदसों रहै निन्यारा ॥
सुरति निरति नामसों राखै । सद्गुरु बचन सत्यकर भाखै ॥
लोभ मोहसों रह निह न्यारा । करम क्रोधते आप उवारा ॥
दुख सुखकी कछु संशय नाही । पाप पुण्य नाही चित माहीं ॥
अरथ द्रव्य मिथ्याकर मानै । जीवन जन्म नाम पहिचानै ॥
दया क्षमा कुल टूट कहावा । विषमें हरषन चितमें लावा ॥