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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1275

ज्ञानस्थितिबोध

( १३५ )

अबु दीपकी सुरतिपर, हंस होय असवार ।
कहै कबीर लै निबहिहौं, कोटि बसैं बटपार ॥
गृहदान रोके नहीं, सुरति हंस लै जाय ।
कहै कबीर यम हारियो, काल पैठि पछिताय ॥
इह गुण ज्ञान स्थितिहिके, गहे शब्द चितलाय ।
कहै कबीर यम हारिया, काल बैठि पछिताय ॥

धर्मदासवचन-चौपाई

धर्मदास बिनती अनुसारी । तुम साहब हम दास तुम्हारी ॥
गुरु शिष्यकी रहनी कैसी । सो समुझाय कहौ गुरु तैसी ॥
योग अयोग मोहि समुझावो । हे दयाल मम त्रिखा बुझावो ॥

सद्गुरु वचन

सद्गुरुवचनहि विहँसि उचारी । अगुण सगुण विच गुरु अचारी ॥
शिष्य पूछि गुरु भए उदासा । सो गुरु उठि आए धर्मदासा ॥
जिमि बालक रोवै बिछाई । मात पिता बहु बोध कराई ॥
येयाविधि गुरु शिष्य हैं मोई । जगमें अमृत पीवैं वोई ॥
शिष्य सीप गुरु स्वाती जानो । गुरुपारस शिष्य लोह समानो ॥
गुरु मलयागिरि शिष्य भुजंगा । गुरु पारस शीतल होय अंगा ॥
गुरु समुद्र है शिष्य तरंगा । गुरु दीपक है शिष्य पतंगा ॥
शिष्य चकोर गुरु शशि जानौ । गुरुरविकमल शिष्यविकशानौ ॥
इह सनेह शिष्य निहचै लहई । गुरुपद परस दर्श हिय गहई ॥
जब शिष्ययाविधिध्यानविशेषा । सो वह सीख गुरु समलेखा ॥
गुरुन गुरुनमों भेद विचारा । गुरु गुरु कहै सकल संसारा ॥
गुरु सोई जिन शब्द लखाया । आवा गौन रहित दिखलाया ॥
गुरुहि सजीवन शब्द लखाया । जाके बल हंसा घर आया ॥
वा गुरुसो कछु अन्तर नाही । गुरु औ शिष्यमताएक आही ॥