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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1226

( ८६ )

बोधसागर

सोई सिद्ध संत है भाई । सोहं नाल चीन्ह जिनपाई ॥
पुरुषहि सम शिरसेज बिछावा । जिन जिन शब्द हमारा पावा ॥
नालहै सत्य पुरुषकी स्वासा । सो नाल पतालमें बासा ॥
तहां है पांजीको दरबारा । ता चढ़ि हंस उतरिगो पारा ॥
पाँच नाम तिहको परवाना । जो कोइ साधु हृदयमें आना ॥

पाँच नाम

साखी—आदि उदित अति अजरमन, सप्त सिंधु निज नीर ।
अदल अदल सोहं गहै, साहब कहै कबीर ॥

चौपाई

यही सप्त नाल हैं सही । यही हंस नाम निरबही ॥
सप्तनालके सातों नामा । बीर बिहंग करै सब कामा ॥
सिंधुनालमें हंस पठाए । पुहुप नालसो सकल सुहाए ॥
अमीनाल महाँ हंस पयाना । सुरति नालसे हंस सिधाना ॥
अग्रनाल महाँ करत अहारा । सोहंग नालको सकल पसारा ॥
अजर नालघट कीन्ह विचारा । तबै पुरुषको दर्श निहारा ॥
सप्त नाल है एके गाऊं । सोई सुरति भेद निज पाऊं ॥
सद्गुरु मिले वस्तु निज पावै । बिन सद्गुरु को भर्म मिटावै ॥
सद्गुरुदया सबै कछु पाई । बिन सद्गुरु वह जाइ नशाई ॥

साखी—सतगुरु बडा सुनार है, परखे वस्तु भैंडार ।
सुरतिहि निरति मिलाइके, मेटि डार खुटसार ॥
सद्गुरु सांचे शब्द हैं, कायाके गुणवान ।
जीवनमुक्त शब्दहि मिले, महापुरुषके ज्ञान ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास विनती अनुसारि । मैं सब पायब तुम बलिहारी ॥
बलिहारी सतनाम तुम्हारी । जाते भयो सबै निस्तारी ॥