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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1225

ज्ञानस्थितिविषय

( ८५ )

पांजी भेद पावा नहिं कोई । ताते गयो बिगोह बिगोई ॥
देहि बीच जोहि लखि पावा । ताकर आवा गमन नशावा ॥
जब तक आप चीन्ह नहिं परई । तब लग काज न एको सरई ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास मैं कहों बिचारी । पांजीभेद कहों अतिभारी ॥
पांजी डोरी चित न धरई । मिथ्या दोष गुरुन कहैं करई ॥
यही भेद है अगम अपारा । अब मैं कहों सकल व्यवहारा ॥
जो चीन्ह है सो दरशन पाई । हंसहि हंस मिले पुनि जाई ॥
अनुचित वचन हमारे धरई । यमकी डगरी जाय सो करई ॥

साखी-पांजी कहों समुझायके; मन बिच लोकहि जाय ॥

मूलशब्द निर्वाण है, कहै कबीर समुझाय ॥

चौपाई

मूल शब्द है गुप्त जो सारा । बिरले पावैं शब्द हमारा ॥
सत्य वचन अस्ती ना माने । गहे हंस सो पहुँच ठिकाने ॥
अग्र अर्चित सुरति सोहंगा । एहि मूल गहि हंस विहंगा ॥
अग्र विहंग नाम जो पावै । तबहीं हंसा घरको आवै ॥
विहंग शब्द जाने नहिं कोई । सो तो गये बिगोह बिगोई ॥
सुरति बिहंगता ले चित जोरी । बिहंग नाम बिहंग है डोरी ॥
बिहंग हंस विहंग है बीरा । निज सोकाम ये कहै कबीरा ॥
बिहंग शब्द बिहंग है नाला । विहंग पुरुष संग हंस बहाला ॥
सातों नाल जो आय बिहंगा । बिहंग पताल आहि जलरंगा ॥
तहैं बैठी जलरंगी शाला । बायें कर पृथ्वीकी नाला ॥
ता ऊपरहि कर्म अवतारा । कहै कबीर भेद टकसारा ॥
लघु दीरघ अक्षर नहिं जाना । कैसे संत होइ निर्वाना ॥
एक भेद जिनही लखि पावा । तिनके काल निकट नहिं आवा ॥