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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1199

उग्रगीता

( ५९ )

सात्त्विक कर्ता जो कछु करई । आपु मेटि प्रभुको चित धरई ॥
आपुको कर्ता नहिं जानै । कर्ता पूरण पुरुष बखानै ॥
ऐसी रहनि रहै जो दासा । नर्क स्वर्गकी ताहि न आसा ॥
सो सत्त्व गुण लक्षण है भाई । जाते कहिये साधु सुभाई ॥
राजस कर्ता आपुको जानै । दाराहित सुत आपको मानै ॥
बहुतै हर्ष शोक तेहि भावै । थोर करै बहुतै फल धावै ॥
तामस कर्ता लक्षण भाई । आलस निद्रा बहुत रहाई ॥
आपु अयोग चाहै पुरुषारथ । ह्वै अधीन नहिं चाहै स्वारथ ॥
कारज होइ गये अब जाको । दिन औ राति बतावै ताको ॥
भोर होइ सो दिवस बतावै । तामसकर यह सदा सुभावै ॥

त्रिप्रकार बुद्धिको वर्णन

तीनि प्रकार बुद्धि है भाई । प्रथमैं सुमिरन मैं ठहराई ॥
निवृत्ति प्रवृत्ति जो मारग जानै । करै विचार धर्म पहिचानै ॥
काज अकाज न बंध न मोक्षण । सो साध्वी है सात्त्विक लक्षण ॥
दुसरी बुद्धि तो धर्म अधर्मा । काज अकाज जाने सब पर्मा ॥
राजस बुद्धि लक्षण यह भाई । मनमें सहा विचार कराई ॥
तामसबुद्धि अब सुनहु सुजाना । क्रोध लिये मन विषय सुजाना ॥
धर्महि सो अधरम करि जानै । करै अधर्म धर्म पहिचानै ॥
ता अधरम कह धर्म जो कहई । सदा तामसी बहु दुख सहई ॥

त्रिप्रकार धीरज

सात्त्विक धीरज वरणि सुनाऊ । संशय तोर जो सकल मिटाऊं ॥
पांच तत्त्व मन संयम साधै । सकल कामना यह अवराधै ॥
इंद्री सकल एक सम कराई । सात्त्विक ऐसो धीर धराई ॥
राजस धीरज है परसंगा । पारस लागे धर्म उमंगा ॥
कर्म करै संगति ते सोई । औ फल चाहै राजस होई ॥