कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1198, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( ५८ )
बोधसागर
संन्यास त्रिप्रार वर्णन
संन्यास त्याग तीनि गति होई । अनिष्ट इष्ट मिश्र गति सोई ॥
अनिष्ट नर्ककी योनी भुक्ते । देव योनिको इष्ट संयुक्ते ॥
मिश्र मानुषकी देह जो पावै । तीनों गति गीता बतलावै ॥
त्रिप्रकार क्रिया वर्णन
कहौ क्रिया तीनिहु समुझाई । ज्ञान कर्म कर्ता जो आई ॥
ज्ञान क्रिया त्रिप्रकार
प्रथमैं ज्ञान सुनौ चितलाई । ताकर लक्षण तीनि बताई ॥
जबही ज्ञान हृदयमें आवै । सर्व त्यागि प्रभुको लवलवै ॥
सर्व व्यापि जो ब्रह्महि जानै । सात्त्विक लक्षण ज्ञान बखानै ॥
राजस लक्षण जानै प्रभु न्यारा । न्यारा २ ब्रह्म विचारा ॥
तामस लक्षण एक ठौरहि जानै । मूरति प्रतिमा पूजा ठानै ॥
ताहि एहै ठाकुर है येही । परम पुरुषते नाहिं सनेही ॥
जेहि देवा कौ जो कोई ध्यावै । तेहि देवहि ठाकुर ठहरावै ॥
यह लक्षण तम गुण व्यवहारा । तामैं वास है नरक दुबारा ॥
कर्म क्रिया त्रिप्रकार वर्णन
दोसर कर्म लक्षण है तीनि । जानै कोउ साधू परबीनी ॥
कर्म करै फल चहैन ताको । पुत्र कलत्र असंग सदाको ॥
राग द्वेष जाके नहिं आवै । एतौ सत्त्वगुण कर्म सुभावे ॥
राजस कर्म सुनावौं मीता । करि २ कर्म कामना प्रीता ॥
कर्म अधिकार आपु ना होई । फल वांछै मन राजस सोई ॥
तामस कर्म सुनौ तुम भाई । तप स्नान औ जप लर जाई ॥
हठ करि कर्म करै बहु भाई । दुख सुख अह निशि लहै सदाई ॥
ता प्रकार क्रोधहु बहु होई । तामस नर्क वास है सोई ॥
कर्ता लक्षण त्रै प्रकार
तीसर कर्ता रूप बखानौं । कारण करण करै सोइ जानौं ॥