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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1183

उग्रगीता

( ४२ )

ऐसे पारब्रह्म पहिचानौ । ताकी महिमा वेद बखानौ ॥
जो कोइ साधू साधन करई । इंद्री त्यागे गुण परिहरई ॥
काम क्रोध मद लोभ न आवै । तंतु प्रकृति लै दूरि बहावै ॥
माया रहित ब्रह्म है सोई । ताको आवागमन न होई ॥
माया लिप्त रहै संसारी । लोभ मोहमें भूले भारी ॥
कैसहु नहीं ब्रह्म कहैं बूझै । अंध नयन हृदये नहिं सूझै ॥
सुख संपत्ति हित चित्तसो गहई । ता परताप नर्क सो परई ॥
सुकर श्रान जन्म सो धरई । माया लीन सदा सो करई ॥
चौरासी कर्म जेहि गुण होई । निष्कर्महि जाने नहिं कोई ॥
आतम परमात्म नहिं जाने । पारब्रह्म मन कबहिं न आने ॥
रहत समीप सदा सुख सोई । न्यारा कबहीं नाहिं विछोई ॥
जैसे सूर्य जो रहै अकासा । ऐसे क्षेत्र क्षेत्रज्ञ है वासा ॥
कर्म लिप्त जिव नाम धराया । पारब्रह्म संयोग बनाया ॥
माया विना ब्रह्म जो होई । पारब्रह्म पुनि कहिये सोई ॥
आपुन आपा खोइ भुलाना । माया संग सदा सुख माना ॥
ता कारण भ्रम चौरासी । फिरि २ भवसागरके वासी ॥
ताते निर्गुण भक्ति न होई । सगुण भाव बतायो सोई ॥
कर्म करिय करि निर्मल होई । ऐसो तारो सब नर लोई ॥
मन वच कर्म मोहि चित्त राखै । मेरो ध्यान सदा अभिलाषै ॥
यहि प्रकार नर मोकहैं गावै । सुख संपत्ति धन लक्ष्मी आवै ॥
ब्रह्म यज्ञ त्रैदश अध्याई । क्षेत्र क्षेत्रज्ञहि वरणि सुनाई ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर सुनो धर्मदासा । ऐसा भेद सो काल प्रकाशा ॥
कहिं २ निर्गुण सगुणे ल्यावै । पारब्रह्मते दूरि बहावै ॥
काह कहौ कहैलंगि गोहरावौ । अंधहि मारग कैसे पावौ ॥