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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1182

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बोधसागर

अथ त्रयोदशोऽध्यायः

श्रीकृष्ण उवाच

अर्जुन सों बोले गोपाला । निर्मल ज्ञान सुनौ यहि काला॥
माया ब्रह्म सदा संयोगा । माया संग जीव पुनि भोगा ॥
तीनिउ गुण मायाते भयङ्ग । रजगुण तमगुण सतगुण भयङ्ग॥
रजगुण ब्रह्मा सृष्टि पसारा । सतगुणपोषण विष्णु विचारा॥
तमोगुण रुद्र सँघारै सोई । तीनिउ पुत्र माया के होई ॥
पृथ्वी तेज वायु आकाशा । जलमिली पांचउ तत्त्व प्रकाशा॥
दश इंद्री कीन्हो बंधाना । कर्म पांच २ है ज्ञाना ॥
मनबुद्धि चित अहंकार जो कीन्हा । इच्छा दोइ यक धीरज चीन्हा
दुख सुख क्षेत्र जो कीन्हा माया । क्षेत्रज्ञ पुरुष अविगति समाया॥
क्षेत्र देह क्षेत्रज्ञ जिव होई । चेतन जीव अचेत समोई ॥
देह धरेते जिव दुख पावै । माया जड़ कछु शोक न आवै॥
आदि अनादि ब्रह्म औ माया । कारण सृष्टि धरे दुह भाया ॥
जैसे वृक्ष २ की छाया । वृक्ष विना छाया नहिं माया॥
ऐसे ब्रह्म सदा यक संगा । कारण सृष्टि रच्यो अर्थज्ञा ॥
अर्जुन व्यापक जीवहि जानो । अतो न न्यारो ब्रह्म पिछानो॥
जीवात्म माया भयो अंगा । परमात्म देखहु सब संगा ॥
पारब्रह्म सो लिप्त न होई । हाथ पांव इंद्री नहिं कोई ॥
सर्वेन्द्री जाके चहुँ ओरा । जहां तहां परकट सब ठौरा ॥
नैन चहुँ दिशि देखै सोई । कानन सर्व गुण सुने है जोई॥
मुख सकलौ जो खाय खवावै । पाव पवनते अधिक जो धावै॥
हाथ ऐसे जो रच संसारा । नासा सकल वास विस्तारा ॥
जो कहिये तौ सकलौ सोई । नाक होई तौ कछु न होई ॥
जाके कोई पुण्य न पापा । अलख रूप सो आपै आपा ॥