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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1176

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बोधसागर

वदन अनेक भरे औ रीते । ऋषिसुनिवर तहाँ भये विपरीते॥
भुजधारी बहु बाहु विराजें । ऐसे कैसो दरशन राजें ॥
पाव पताल रहा जब जाई । शीश अकाश सातये भाई ॥
भूषण भांति २ के छाजें । मुकुट अनेक शीश पर राजें ॥
सूर्य चंद्रमा तहां रहाई । ऋषिसुनिवर तहाँ विनती लाई ॥
जहाँ लगि देवी देवता आहीं । सब देखो तिनके मुख माहीं ॥
अर्जुन देखि अचंभौ कीन्हा । अति डरि भये बहुत अधीना ॥
देवता ठाढ़े अस्तुति करहीं । भौ व्यापैं विलु मारे मरहीं ॥
किन्नर यक्ष गुणी सब ठाढ़े । कैंपैं सबैं देखिके गाढे ॥
राक्षस देखत भागे जाहीं । कोइ नेरे कोइ दूरि पराहीं ॥
कोइ जन अस्तुति करै मनुहारी । अब रक्षा प्रभु करौ हमारी ॥
कोइ एक जन दुरि परिहरहीं । कोइ जन निहुरी दंडवत करहीं॥
ऐसे स्फुट सकल जग देखा । तहवां रहे समाइ विशेषा ॥
औ मुख देखा बहुत भयावन । जानौ अब चाहत है खावन ॥
मुखमें तीन लोक जो देखा । तहवां रहे समाइ विशेषा ॥
जहाँ लगि साधु असाधु कहावै । सो सब ताके मुखमहँ आवै ॥
दुर्योधन देखा मुख माहीं । भीष्म द्रोणाचार्य जो आहीं ॥
योधा चले सबैं मुख माहीं । कौरौ पाण्डव उदर समाहीं ॥
कोस अड़तालिसकटक जोरहिया । सो सब मुखमें देखो तहिया॥
संसारी त्रैलोक पसारा । सो सब मुखके मध्य निहारा ॥
नदी आवै जस एकै धारा । सागर माहिं धसे सब खारा ॥
ऐसे जग सब उदर समावै । मुख माहीं सबही चलि आवै॥
जैसे जोत चांदना होई । जीव जन्तु सब लेइ समोई ॥
केतक डाढ़न माहीं अटके । केतक भागे फिरत जो भटके ॥
कोइ कतहुँ जाने नहीं पावै । बढ़ुरि २ मुख माहिं समावै ॥