कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1175, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंउग्रमाता
( ३६ )
अथ एकादशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
अर्जुन कृष्ण सो बिनती ठानी । हे स्वामी तुम अन्तर्यामी ॥
दश अध्याय तुम वरणि सुनायो। ज्ञान विज्ञान जो मोहि बतायो॥
सन्यासकर्म और वाक्य सुनायो। आतम संयम योग बातायो ॥
प्रवृत्ति निवृत्ति जो मारग भाषा । कर्म योग मन हट करि राखा ॥
यह सब सुनिनिर्मल भयो अंगा । अब मोहि दर्शन भयो उमंगा ॥
होउ दयाल विराट देखावौ । मति मोकहैं तुम दूरि बहावौ ॥
जो मोहिं शक्ति न देखत होई । तौ अब शक्ति दीजिये सोई ॥
तुम ठाकुर हौ अंतर्यामी । अब दर्शन बिन रहौं न स्वामी॥
अहो दयाल कृपा-निधि-सारग । दीनबंधु तुम पतित-उजागर ॥
तब हरि बोले चतुर सुजाना । इन नैनन्ह नहीं दर्शन जाना ॥
तुम तौ हौ निज भक्त हमारे । दर्शन तुम कह देउ पियारे ॥
यह सरूप काहू नहीं देखा । इंद्रादिक सुर नर सुनि शेषा ॥
सो दर्शन तुम देखा चैहौ । तीनि लोक हलकंप बढैहौ ॥
देखौ कालरूप जब मोरा । अर्जुन तुम तब रहौं न ठौरा ॥
डरपो बहुत होइ डर भारी । डरपै लोग सकल संसारी ॥
कहैं अर्जुन सुनु कृष्ण सुरारी । प्रथम देहु हटता मोहि भारी ॥
जो मैं डरौं दरसको करई । विनु मारेही मृतक होइ रहई ॥
सोई दृष्टि मोहि देव गुसाईं । जेहि दरशे परसौं तुम पाईं ॥
दिव्य दृष्टि अर्जुन कहैं दीन्हा । अर्जुन है मम दरश अधीना ॥
धारो रूप अकाश पताला । महा स्वरूप भयंकर काला ॥
माथ अनेक अनेकन्ह नयना । कर्ण अनेक बहुत मुख बयना ॥
नाक अनेक रू दंत अनेका । चितवत दृष्टि मारि है वेगा ॥
निकसि दाढ़ बाहे मुख भारी । तिन देखत जिव नाहिं सँभारी॥