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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1173

उग्रगीता

( ३३ )

जल जीवन जलसाइ कहाई । मेरो रूप सुभाव रहाई ॥
ज्वारिन महाँ मैं जुवा कहावा । जुवा रूप मेरो रूप सुभावा ॥
जहाँ लगि जगमें होइ लराई । मेरो रूप लराई भाई ॥
जग परपंच जहां लग होई । परपंच रूपमें रहौं समोई ॥
वाद विवाद करै जो ज्ञानी । वाद रूप मोकहैं पहिचानी ॥
शंकर रूप मोर है भाई । मृत्युकालमें रहौं समाई ॥
पाप पुण्य धारौं दुइ देही । कर्म धर्म रचना है एही ॥
जग रचना विभूति मेरी होई । जल थलमें मैं रहौं समोई ॥
कहैं लगि वणौं वरणि बखानौं । सब वसुधामें मोहीं जानौं ॥
मोहिं छोड़ि कोइ और न दूजा । तीन लोकमें मेरी पूजा ॥
देवी देवता पूजा लावैं । सो सब पूजा मैं कहलावैं ॥
विभूति रूप अध्याय है दशवां । इह लगि भाव बतायउँ दशवां ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर सुनौ चितलाई । धर्मदास तुम लेहु अथाईं ॥
तीनि लोक नायक भगवाना । तिन कह पुरुष दीन्ह रजधाना ॥
ताते क्रीडा करै अनंदा । खेल अनेक खेल गोविंदा ॥
तीनि लोक बाजी दइ राखा । परपंची अपने मुख भाखा ॥
सत्य कहइ सत्य भाव लखावै । करि प्रपंच जीवन भरमावै ॥
जीव जो मूल बीजके आही । इन पाया सब पुरुषके पाही ॥
बीज आदि तिहुलोक जो फूला । आपुहि जानै पुरुषहि तूला ॥
करि अभिमान पुरुष विसरावा । आपुहि पूरण पुरुष कहावा ॥
सर्वमें व्यापक आपुहि रहई । पुरुष भेद नहिं काहु सो कहई ॥
भेद कहैं उजरे पुर तीनो । आपन थापन ताते कीनो ॥
चारिहु वेद नेति जो गावैं । सदगुरु रहित पुरुष बतलावैं ॥

नं. ८ कबीरसागर - २