कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1172, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३२ )
बोधसागर
मेरी गति मति कोइ न जाने । सबै सृष्टि नारायण मानै ॥
ऋषि मुनि देव देवता भाई । उनहू मेरी गति नहिं पाई ॥
मैं तो गति मति सबकी जानौं । व्यापि रह्यो मैं सकल जहानौं ॥
देवि देवता आदि जो मैं ही । ऋषि मुनि सृष्टि अवतार जु लेही ॥
मोहिते आदि और नहिं कोई । सबके आदि करा रचि सोई ॥
पिताकी खबरि पुत्र नहिं जाने । कैसे पितुकी आदि बखानै ॥
आदि अन्तको मेरी पावै । जग रचना सब पुत्र कहावै ॥
विभूति रूप संक्षेप जो कहिया । अर्जुन पूछ कृष्ण पुनि कहिया ॥
सब व्यवहार विभूति सुनावौ । रंचक मोसे कछु न दुरावौ ॥
कृष्ण कहै सुनु कुंतिकुमारा । तोसों कहौं सकल विस्तारा ॥
पहिले सकल जोति जग जो है । शाशि सूर्यकी कीरनि मोहै ॥
सूर्य रूप मेरो है भाई । दूजा भाव जनावौ जाई ॥
शीतल पूरण निर्मल चंदा । है मेरो यह रूप अनंदा ॥
बलीदान यज्ञ जो ठानो । बावन रूप मेरो पहिचानो ॥
सिरजा पवन सबै सुखदाई । मैं ही पवन रूप हौं भाई ॥
चारि वेदमें साम जो वेदा । मेरो रूप सुनो तुम भेदा ॥
व्यास रूप मेरो है भाई । नारद भाव धरउं मैं आई ॥
देवन माहिं इन्द्र पुनि मैं हौं । दानी बलिराजा सो मैं हौं ॥
विषधर माहिं वासुकी हम ही । ईश्वर माहिं महेश्वर हम ही ॥
इन्द्रिय भुक्तौ मनसो मैं ही । राजन माहिं राज करौं मैं ही ॥
मिरगन्ह मध्य सिंह गति मेरी । वृक्षनमें पिप्पल मोहिं हेरी ॥
नदी माहिं हम ही हैं गंगा । समुद्र रूपमें लहरि उतंगा ॥
मुनिवर कपिल हमी हैं भाई । परशुराम योधा हौं भाई ॥
नरसिंह रूप जो मेरो होई । रामचन्द्र तन रूप जो सोई ॥
दत्तात्रय आनंदित रहऊं । ऋषिन मध्य पाराशर अहऊं ॥