सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1134, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1134

( २६६ )

अमरमूल

दूजा कितहुं न देखहि भाई । आप रहा सब ठांव समाई ॥
यही भांति तुम जग समुझावो । जो समुझै तेहिं लोक पठावो ॥
आत्मारामकी परिचय पाई । ताके निकट लोक है भाई ॥
हम तौ एक लोक कहैं दीन्हा । अनंतलोक घट नाहीं चीन्हा ॥
अनंतलोककी परिचय पावै । कहैं कबीर भव बहुरि न आवै ॥
एक बचन तो देउँ लखाई । जिहिं तैं तुम्हरो संशय जाई ॥
एक समय सत लोकहि रहिया । सत्य पुरुष इक मोसन कहिया ॥
हे कबीर हम तुम हैं एका । दूजा भाव मति राखहु ठेका ॥
सुर्त स्वरूप तुम्हारा भाई । शब्द रूप हमही निर्माई ॥
सुरत शब्द निकट इक भाखा । पर्दा अंतर कछू न राखा ॥
ब्रह्म स्वरूप मोहिं कहैं जानौ । केवल ब्रह्म स्वरूप बखानौ ॥
शब्द मोहिं यक सुर्त उतपानी । सो मोकों तुम निश्चय जानी ॥
धर्मराय है मेरो अंशा । सो निज जानहु हमरो वंशा ॥
आदि भवानी रूप बनावा । तामें निश्चय जाय समावा ॥
तीनों गुण हैं मोर प्रकाशा । पांच तत्त्व महाँ मोर निवासा ॥
जीवन रूप कियो हम भाई । आतम रूप जु हमहिं बनाई ॥
पांच तत्त्व परकट हम कीन्हा । निश्चय वासतहां हम लीन्हा ॥
आपहिं सों सब रूप अवतारा । राम कृष्ण परकट संसारा ॥
यह सब रूप मोर है सांचा । इनहि चीन्ह सो यमसों बाँचा ॥
यम माहीं है मोरो रूपा । सब पृथ्वीमह मोर स्वरूपा ॥
चौरासी लख योनी कीन्हा । आप बास योनीमहाँ लीन्हा ॥
हम से दूसर नाहिन कोई । भर्म माँह सब रहे समोई ॥
भर्म रूप हम सृष्टि बनाई । भर्म माँहि सब रहे समाई ॥
सुर नर मुनिगण यक्ष अपारा । राची सृष्टि भर्म व्यवहारा ॥