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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1133

बोधसागर

( २६६ )

साहिब कबीर-वचन

तब कबीर अस कहिबे लीन्हा । ज्ञान भेद सकल कहि दीन्हा ॥
धर्मदास मैं कहौं विचारी । जिहितैं निबहै सब संसारी ॥
प्रथमहि शिष्य होय जो आई । ता कहैं पान देहु तुम भाई ॥
जब देखहु तुम दृढ़ता ज्ञाना । ता कहैं कहहू शब्द प्रवाना ॥
शब्द मांहि जब निश्चय आवै । ता कहैं ज्ञान अगाध सुनावै ॥
अनुभवका जब करै विचारा । सो तौ तीन लोकसों न्यारा ॥
अनुभव ज्ञान प्रगट जब होई । आतमराम चीन्ह है सोई ॥
शब्द निहशब्द आप कहलावा । आपहि बोल अबोल सुनावा ॥
आपहि चुप जो बोलत रहिया । आप वचन अवचन जो कहिया ॥
आप गुरु है शब्द सुनावै । आप शिष्य है सुत समावै ॥
आहि गुरु शिष्य जो होई । देखै सुनै आपही सोई ॥

साखी-देखै सुनै कहै सबै, आपहि रूप अपार ।

आप न चीन्है आप कहैं, भूला सब संसार ॥

चौपाई

यह मति हम तौ तुम कहैं दीन्हा । बिरला शिष्य कोइ पावै चीन्हा ॥
धर्मदास तुम कहौ सन्देशा । जो जस जीव ताहि उपदेशा ॥
बालक सम जाकर है ज्ञाना । तासौं कहहू वचन प्रवाना ॥
जा कहैं सूक्ष्म ज्ञान है भाई । ता कहैं सुन्नन देहु लखाई ॥
ज्ञान गम्य जा कहैं पुनि होई । सार शब्द जा कहैं कहु सोई ॥
जा कहैं दिव्य ज्ञान परवेशा । ता कहैं तत्त्व ज्ञान उपदेशा ॥
अनुभव ज्ञान जाहि कहैं होई । दूसर कितहु न देखै सोई ॥
उग्र ज्ञान जा कहैं परकाशा । आतमराम घटमाहिं निवासा ॥
आतमरामकी परचय होई । आपहि आतमराम है सोई ॥