सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1122, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1122

( २५४ )

अमरमूल

धर्मदास वचन

धर्मदास विन्ती अनुसारी । हे सतगुरु मैं तुम बलिहारी ॥
सतगुण धर्म मोहि समुझाई । जिह्वितें मन संशय चलिजाई॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास चित केहु विचारी । सतगुरु धर्म कहौं निरवारी ॥
प्रथमहि भोजन सब परिहरही । रजगुण भोजन मध्यम करही॥
उत्तम तंड़ुल आन भरावै । बार छानकै तहां मँगावै ॥
उत्तम चौका दीन्ह बहुभांती । शब्द बोल मलकीन्हौं स्वाँती॥
दुग्ध खांड घृत असन करावा । तासौं कहिये सतगुण भावा॥
जितनी क्षुधा होय घट प्रानी । लेव अहार सोई अनुमानी ॥
शब्द बोले परसाद चढ़ावै । भाजी बनै तो अति मनभावै॥
भाजी नहीं तौ जलभर आना । गुरुकहैं देय अधिक सुखमाना ॥
ऊगुर लेय बहुत मन मानी । यह विधि कहिये सात्त्विक ज्ञानी॥
तीसर भाग अभ्यागत देई । तब प्रसाद पवित्र करलेई ॥
अभ्यागत नहिं आपही पावै । राजस धर्म नर्क कह जावै ॥
सतगुरु धर्म छूट जब जाई । राजस तामस आन समाई ॥
सतगुण धर्म करौं प्रतिपाला । निश्चय पावे लोक रसाला ॥
चैतन्य पुरुषमें जाय समाई । दुविधा भाव सबै मिट जाई॥
रजगुण तमगुण सतगुण कहिये । सब मिट जाय ज्ञान जो पड़ये
सब कहैं भर्म भूत करडारा । झूठी बात भेट औटारा ॥
सबै ब्रह्म ना दूसरे कोई । दूजा भर्म मिट गये सोई ॥
वेद शास्त्र सब कहै बखानी । वचन बिलास कहैं सब ज्ञानी॥
छळ शास्त्र मिल झगरा कीन्हा । ब्रह्म रूप कारू नहिं चीन्हा ॥
चीन्हैं तौ जो दूसर होई । भर्म विवाद करें सब कोई ॥
एके ब्रह्म अखंडित कहई । खंडित ज्ञान महीं निसदिन रहई॥